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सुखी आदमी  (काव्य) 
   
Author:केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal

आज वह रोया
यह सोचते हुए कि रोना
कितना हास्यास्पद है
वह रोया

मौसम अच्छा था
धूप खिली हुई
सब ठीक-ठाक
सब दुरुस्त
बस खिड़की खोलते ही
सलाखों से दिख गया
ज़रा-सा आसमान
और वह रोया

फूटकर नहीं
जैसे जानवर रोता है माँद में
वह रोया।

- केदारनाथ सिंह

 

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