वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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मदिरा ढलने पर | कविता (काव्य) 
   
Author:हरिहर झा | Harihar Jha

 

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

प्यास बुझाने पानी मांगा
अमृत की अब चाह नहीं

नन्हा दीपक साथ मे हो
आवश्यक जगमग राह नहीं

मौत आये यों सजधज कर
फिर र्स्वगलोक मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

दुनिया मे नहीं कोई पराया
सब के सब अपने देखे

सबकी यादें मीठी मीठी
फिर मिलने के सपने देखे

क्या खूब लुभाती मृगतृष्णा
तृप्ति मिलने पर क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

निंदक नियरे पानी बन कर
चित साफ करें धोयंे विकार

शत्रु भी कर दें सावधान
हों पग बढ़ने को जब तैयार

खलनायक मे जब राम छिपा
प्रभु प्रगट हुये तो क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

कांटे भी रक्षा करने को
तैयार खड़े हैं होशियार

फूलों का उपवन क्यों चाहूं
हर कलि सुगंधित है अपार

जुगनू की जगमग अति सुन्दर
पूनम की रात मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

- हरिहर झा

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