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राजा का महल | बाल-कविता  (बाल-साहित्य )  Click To download this content
   
Author:रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

नहीं किसी को पता कहाँ मेरे राजा का राजमहल!
अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल?
इसकी दीवारें चाँदी की, छत सोने की धात की,
पैड़ी-पैड़ी सुंदर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की।
इसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घरबार,
सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार।
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में:
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में!

सात समंदर पार कहाँ पर राजकुमारी सो रही,
इसका पता सिवा मेरे पा सकता कोई भी नहीं।
उसके हाथों में कँगने हैं, कानों में कनफूल,
लटें पलंग से लटकी लोटें, लिपट रही है धूल।
सोन-छड़ी छूते ही उसकी निंदिया होगी छूमंतर,
और हँसी से रतन झरेंगे झर-झर, झर-झर धरती पर।
राजकुमारी कहाँ सो रही, तू सुन ले माँ कान में:
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में।

बेर नहाने की होने पर तुम सब जातीं घाट पर,
तब मैं चुपके-चुपके जाता हूँ उसी छत के ऊपर।
जिस कोने में छाँह पहुँचती, दीवारों को पार कर,
बैठा करता वहीं मगन-मन जी भर पाँव पसार कर।
संग सिर्फ मिन्नी बिल्ला होता है छत की छाँव में,
पता उसे भी है नाऊ-भैया रहता किस गाँव में।
नाऊ-टोला कहाँ, बताऊँ? -तो सुन ले माँ कान में:
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में।

- रवीन्द्रनाथ

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साभार - रवीन्द्रनाथ का बाल साहित्य
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
अनुवादक - युगजीत नवलपुरी

Children's literature by Rabindranath Tagore

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