वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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डा रामनिवास मानव के दोहे (काव्य) 
   
Author:डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

डॉ. 'मानव' दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ दोहे यहां दिए जा रहे हैं:

1
ये पत्थर की मूर्तियां, ये पाहन के देव।
इनकी पूजा-अर्चना, मुझको लगे कुटेव।।


2
गगन-विहारी देवता, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।
मिलकर कुछ ऐसा करें, विश्व का मिटे क्लेश।।


3
अब तक जब मांगा नहीं, कभी किसी से दान।
फिर तुमसे मां शारदे, मांगूं क्यों अवदान।।


4
देना हो तो दो मुझे, बस इतना वरदान।
शब्द-शब्द समिधा बने, अर्थ-अर्थ यजमान।।

5
अग्निधर्मा अर्थ हो, शक्तिधर्मा शब्द।
अपने हाथों से लिखूं, कविता का प्रारब्ध।।

6
इतनी विनती और है, देना यह आशीष।
कभी याचना के लिये, झुके न मेरा शीश।।

 

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