भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

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नैतिकता का बोध (कथा-कहानी) 
   
Author:रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

एक यात्री ने दूसरे से कहा, "भाई जरा हमको भी बैठने दो।"

दूसरे ने कहा, "नहीं! मैं आराम करूंगा। "पहला आदमी खड़ा रहा। उसे जगह नहीं मिली, पर वह चुपचाप रहा।

दूसरा आदमी बैठा रहा और देखता रहा। बड़ी देर तक वह उसे खड़े हुए देखता रहा। अचानक उसने उठकर जगह कर दी और कहा, "भाई अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आप यहां बैठ जाइए।"

-रघुवीर सहाय

[ लघु कथा देश देशान्तर,  संपादक-सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु',  अयन प्रकाशन, 2013]

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