मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।

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खौफ़ (काव्य) 
   
Author:जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

जाने-पहचाने पेड़ से
फल के बजाय टपक पड़ता है बम
काक-भगोड़ा राक्षस से कहीं ज्यादा खतरनाक

अपना ही साया पीछा करता दीखता
किसी पागल हत्यारे की तरह
नर्म सपनों को रौंद-रौंद जाती हैं कुशंकाएँ
वालहैंगिंग की बिल्ली तब्दील होने लगती है बाघ में

इसके बावजूद
दूर-दूर तक नहीं होता कोई शत्रु
वही आदमी मरने लगता है
जब खौफ़ समा जाता है मन में

-जयप्रकाश मानस
[ अबोले के विरुद्ध, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली ]

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