बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर।

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सियासत की सराब, जनता की हवा खराब (विविध) 
   
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

मार्च, 2019 चल रहा है। इन दिनों भारत में चुनाव प्रचार की धूम मची हुई है। सभी राजनैतिक दल अपनी पूरी शक्ति व सामर्थ्य से चुनाव प्रकार में लगी हुई है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुरुवार (28 मार्च 2019) को मेरठ से लोकसभा चुनाव प्रचार-प्रसार आरंभ किया। उन्होंने एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के साथ सपा, बसपा और रालोद पर भी जमकर प्रहार किया। चुनावी दौर में इस प्रकार का वाक्-युद्ध कोई अपवाद नहीं है। अपने चुटकीले भाषणों के लिए प्रसिद्ध प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा--'सपा का 'स', रालोद का 'रा' और बसपा का 'ब' मतलब सराब, ये शराब आपको बर्बाद कर देगी।' प्रधानमंत्री का आशय 'शराब' से था लेकिन 'शराब' को 'सराब' कहे जाने का यह प्रयोग आज तक कभी सुनने में नहीं आया।

हाँ, उर्दू के शायर मीर तक़ी मीर ने अपनी एक ग़ज़ल में इन दोनों शब्दों 'शराब' और 'सराब' का, बड़ी सफलता से उपयोग किया है। उस ग़ज़ल में से उनके दो शेर इस प्रकार हैं:

"हस्ती अपनी हबाब की सी है
 ये नुमाइश सराब की सी है"

'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में
 सारी मस्ती शराब की सी है"

शराब को मदिरा, सुरा, मद्य, मधु, सोमरस, वारुणी, हाला, आसव, मय इत्यादि नामों से जाना जाता है। हाँ, देसी भाषा में इसे 'दारू' भी कहा जाता है, लेकिन शराब को 'सराब' तो पहली बार प्रधानमंत्री के मुख से ही सुना है। यह बात नहीं है कि 'सराब' कोई शब्द नहीं है, 'सराब' का अर्थ है, 'मरीचिका'। इसे मृग मरीचिका, मृगतृष्णा। अँग्रेजी में मरीचिका को 'mirage या illusion' कहा जाता है।

यह बाणमती के कुनबे वाली राजनैतिक शब्दावली हमारी भाषा व आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक है।

क्या यह राजनैतिक वाक्-युद्ध अब यहीं विराम लेगा? अब विपक्षी दल अपना वाक चातुर्य प्रमाणित करने में लग जाएंगे।

जब देश में अनेक गंभीर मुद्दे हों जिनपर चर्चा होनी चाहिए, उसकी जगह बेसिर-पैर की बातों और जुमलेबाजी का क्या अर्थ लगाना चाहिए? देश में सर्वोच्च स्तर पर क्या राजनीति केवल जुमलेबाजी बनकर रह गई है।

आपने निसंदेह 'सराब' शब्द का गलत उपयोग किया, मोदीजी। सच तो यह है कि हमें सियासत की 'सराब' यानि मरीचिका छल रही है। 

क्या राजनीतिज्ञों को लगता है कि जनता निपट अपढ़ और मूर्ख है?

फिर किसी दिनकर को कहना पड़ता है:

"सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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