राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

Find Us On:

English Hindi
Loading
दादू दयाल की वाणी  (काव्य)  Click To download this content
   
Author:संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal

इसक अलाह की जाति है, इसक अलाह का अंग।
इसक अलाह औजूद है, इसक अलाह का रंग।।

घीव दूध में रमि रह्या सबही ठौर।
दादू बकता बहुत है, मथि काढैं ते और।।

कहैं लखैं सो मानवी, सैन लखै सो साध।
मन की लखै सु देवता, दादू अगम अगाध।।

आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ।
दादू उस मासूक का, अल्लाह आसिक होर्इ।।

मिश्री माँ है मिलि करि, मोल बिकाना बाँस।
यों दादू महिंमा भया, पार प्रह्म मिलि हंस।।

केते पारिख पचि मुए, कीमति कहीं न जार्इ।
दादू सब हैरान है, गुनें का गुण खार्इ।।

माया मैली गुण भर्इ, धरि धरि उज्जवल नाँव।
दादू मोहे सबन को, सुर नर सबहीं ठाँव।।

दादू ना हम हिन्दू होहिगे, ना हम मुसलमान।
षट दर्शन में हम नहीं, हम राते रहिमान।।

इस कलि केते ह्वै गये, हिन्दू मुसलमान।
दादू साची बंदगी, झूठा सब अभिमान।।

दादू केर्इ दौड़े द्वारिका, केर्इ कासी जाहिं।
केर्इ मथुरा की चलैं, साहिब घरहि माँहि।।

अंतर गति और कछू, मुख रसना कुछ और।
दादू करनी और कछु, तिनकौ नाहीं ठौर।।

काला मुँह करि करद का, दिल तें दूरि विचार।
सब सूरति सुबहान की, मुल्ला मुग्ध न मार।।

दादू निदक बपुरा जिनि मरै, पर उपकारी सार्इ।
हमकूँ करता ऊजला, आपण मैला होर्इ।।

सांचा सबद कबीर का मीठा लागैं मोहि।
दादू सुनता परम सुख, केता आनन्द होहि।।

- दादू दयाल

Previous Page  | Index Page  |    Next Page

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश