मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।

Find Us On:

English Hindi
रहीम और कवि गंग (कथा-कहानी) 
   
Author:भारत-दर्शन संकलन | Collections

कहा जाता है कि रहीम दान देते समय ऑंखें उठाकर ऊपर नहीं देखते थे। याचक के रूप में आए लोगों को बिना देखे वे दान देते थे। अकबर के दरबारी कवियों में महाकवि गंग प्रमुख थे। रहीम के तो वे विशेष प्रिय कवि थे। एक बार कवि गंग ने रहीम की प्रशंसा में एक छंद लिखा, जिसमें उनका योद्धा-रूप वर्णित था। इसपर प्रसन्न होकर रहीम ने कवि को छत्तीस लाख रुपए भेंट किए।

रहीम की दानशीलता पर कवि गंग ने यह दोहा लिखकर भेजा -

सीखे कहां नवाबजू, ऐसी दैनी देन
ज्यों-ज्यों कर ऊंचा करो त्यों-त्यों नीचे नैन।।

रहीम ने गंग कवि की बात का उत्तर बड़ी विनम्रतापूर्वक देते हुए यह दोहा लिखकर भेज दिया-

देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन।।

प्रस्तुति - रोहित कुमार 'हैप्पी'

#

[भारत-दर्शन संकलन]

 

Previous Page  | Index Page  |    Next Page
 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश