वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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विजयादशमी (काव्य) 
   
Author:सुभद्रा कुमारी

विजये ! तूने तो देखा है,
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म-भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुणा का धाम सखी !!

बनवासी असहाय और फिर
हुआ विधाता वाम सखी !
हरी गई सहचरी जानकी
वह व्याकुल घनश्याम सखी !।

कैसे जीत सका रावण को
रावण था सम्राट सखी !
रक्षक राक्षस सैन्य सबल था
प्रहरी सिंधु विराट सखी !!

राम-समान हमारा भी तो
रहा नहीं अब राज सखी !
राजदुलारों के तन पर हैं
सजे फकीरी साज सखी !!

हो असहाय भटकते फिरते
बनवासी-से आज सखी !
सीता-लक्ष्मी हरी किसी ने
गयी हमारी लाज सखी !!

रामचन्द्र की विजय-कथा का
भेद बता आदर्श सखी !
पराधीनता से छूटे यह
प्यारा भारतवर्ष सखी !!

सबल पुरुष यदि भीरु बनें तो
हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें, देश में--
करें युद्ध घमसान सखी !!

पापों के गढ़ टूट पड़ें औ
रहना तुम तैयार सखी !
विजये! हम-तुम मिल कर लेंगी
अपनी माँ का प्यार सखी !!

- सुभद्राकुमारी चौहान

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