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फीजी में हिंदी (विविध) 
   
Author:विवेकानंद शर्मा

फीजी के पूर्व युवा तथा क्रीडा मंत्री, संसद सदस्य विवेकानंद शर्मा का हिंदी के प्रति गहरा लगाव था । फीजी में हिंदी के विकास के लिए वह निरंतर प्रयत्नशील रहे।

फीजी में हिंदी भाषा के विकास का इतिहास सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है । ऐतिहासिक दृष्टि से सन् 1879 में शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत भारतीय मजदूरों का प्रथम दल फीजी पहुंचा था तथा उन्हीं के द्वारा फीजी में हिंदी भाषा का भी आगमन हुआ लेकिन इधर कुछ ऐसे तथ्य प्रकाश में आए है जिनसे प्रतीत होता है कि सन् 1879 से काफी पहले फीजी के बंदरगाहों पर आने वाले अनेक जहाजों में खलासी आदि का कार्य करने वाले भारतीयों के द्वारा यह द्वीप हिंदी भाषा का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष परिचय पा चुका था ।

जैसा कि आज समस्त विश्व जानता है कि शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत जो भारतीय कुली ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े उपनिवेशों में भेजे गए थे, उनके वे दिन उत्पीड़न, कष्ट, दैन्य और वेदना के दिन थे, जब उन्होंने अपनी मातृभूमि से हजारों मील दूर लगभग निस्सहाय स्थिति में गन्ने के खेतों में दिन-रात कड़ा परिश्रम किया और अपने गाढ़े पसीने से उस पराये देश की धरती को सींचा जहां उन्हें निर्वासन के दिन गुजारने पड़ रहे थे । इन विजातीय लोगों के बीच अपने अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष कितना कठिन और दुर्धर्ष रहा होगा यह आज कल्पना का ही विषय है उनकी सन्तानों के लिए, अनुभव का नहीं ।

दुनिया भर में अपने धर्म, जाति, संस्कृति व भाषा की रक्षा के लिए किए जाने वाले अनेक संघर्षों की दास्तानें आप लोगों ने सुनी, पढ़ी होंगी लेकिन प्रवासी भारतीयों ने अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा की कड़ी लड़ाई जीती तो केवल हिंदी भाषा के हथियार से ही । पराजय और निराशा की चरम स्थितियों में उन्हें साहस और सांत्वना देने का महान कार्य परमपूज्य तुलसीदास की रामायण ने ही किया था जिसे मैं हिंदी भाषा का हिमालय कह दूं तो अत्युक्ति न होगी ।

जिस तरह हिमालय भारत मां का अडिग प्रहरी है, उसी तरह गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस हमारे देश में प्रवासी भारतीयों की भाषा, धर्म, संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने वाला प्रहरी है । आज फीजी को स्वतंत्र हुए कई वर्ष हो चुके है । स्वतंत्र फीजी राष्ट्र में हिंदी भाषा की उन्नति के लिए अनेक प्रकार के कदम उठाए गए है । यहां के स्कूलों में कक्षा 1 से लेकर 10वीं कक्षा तक हिंदी भाषा की शिक्षा दी जाती है तथा उनकी परीक्षाएं भी होती है । भाषा और साहित्य का मिला-जुला प्रश्न-पत्र परीक्षा का आधार होता है । फीजी के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश हिंदी पाठ्य पुस्तकें फीजी के हिंदी विद्वानों द्वारा ही तैयार की गई है । पाठ्य-पुस्तकों में सम्मिलित अनेक उपन्यास और कहानियां भारत के लेखकों की है। यहां स्कूलों में हिंदी के अध्यापक, हिंदी विषय के अतिरिक्त अन्य विषयों को भी पढ़ाते है ।

हिंदी भाषा और साहित्य का अपेक्षाकृत गहन अध्ययन व प्रशिक्षण यहां के दो प्रमुख टीचर्स कॉलेजों में दिया जाता है । इनके नाम है- 'टीचर्स ट्रेनिंग कालेज, नसीनू व 'लौटाका टीचर्स कॉलेज, लौटाका ' । यहां प्रेमचंद के उपन्यास गोदान, निर्मला, सेवाश्रम आदि पाठ्य-पुस्तक के रूप में पढाये जाते हैं ।

फीजी के एकमात्र विश्वविद्यालय यूनीवर्सटी आफ साउथ पैसेफिक ' में उच्चस्तरीय हिंदी अध्ययन-अध्यापन का कोई स्वतंत्र विभाग नहीं है लेकिन 'एलीमेंटरी लेवल ' पर हिंदी विषय की पढ़ाई की व्यवस्था आरंभ कर दी गयी है ।

फीजी में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में रेडियो फीजी की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । सुबह साढ़े पांच बजे से रात बारह बजे तक रेडियो पर विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित होते रहते है । इसमें सर्वाधिक कार्यक्रम हिंदी भाषा में ही होते है । पूरे दिन में लगभग पंद्रह-सोलह घंटे तक हिंदी के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। रेडियो-विज्ञापनों में भी हिंदी भाषा को ही प्रमुखता प्राप्त है । अधिकांश कार्यक्रम हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों पर आधारित होते है।

रेडियो के साथ ही साथ हिंदी फिल्मों के महत्त्व को भी रेखांकित करना आवश्यक है । सारे फीजी देश के विभिन्न नगरों में अनेक सिनेमाघर है और उनमें शायद ही कोई ऐसा सिनेमाघर होगा जहा हिंदी फिल्म न दिखाई जाती हो। भारतीय लोगों के अतिरिक्त अन्य भाषा-भाषी तथा काईबीत्ती लोगों में भी, जो फीजी के मूल निवासी है, हिंदी फिल्म देखने का बड़ा शौक है । यहां टेलीविजन सेट घर-घर में है लेकिन यहां कोई केंद्रीय राष्ट्रीय प्रसारण नहीं होता है। सभी लोग अपने-अपने टेलीविजन पर वीडियो फिल्म देखते हैं । हिंदी वीडियो फिल्म यहां सवाधिक देखी जाती है । स्थान-स्थान पर हिंदी वीडियो फिल्म किराए पर देने वाली दुकानें है ।

रेडियो व सिनेमा के बाद हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य समाचार-पत्रों के माध्यम से हो रहा है । कुछ वर्ष पहले यहां से पांच हिंदी साप्ताहिक समाचार-पत्र प्रकाशित होते थे लेकिन इधर बढ़ती हुई आर्थिक कठिनाइयों व विज्ञापनों की कमी के कारण दो हिंदी साप्ताहिक पत्र ही निरंतर प्रकाशित हो पा रहे है । इनके नाम है 'प्रशांत समाचार' और 'शांतिदूत' । फीजी सरकार के सूचना विभाग द्वारा भी दो हिंदी मासिक पत्र- 'शंख' और फीजी वृत्तांत' प्रकाशित होते है ।

फीजी में किसी भी प्रकार की हिंदी साहित्यिक पत्रिका का निरंतर अभाव रहा है । इस अभाव के परिणामस्वरूप यहां की नवोदित साहित्यिक प्रतिभाओं को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है । वर्षो से चले आ रहे इस अभाव की पूर्ति की दिशा में हिंदी महापरिषद, फीजी की ओर से एक त्रैमासिक पत्रिका 'उदयाचल' का प्रकाशन आरंभ हुआ है । इस पत्रिका का प्रवेशांक फीजी के महाकवि और हिंदी विद्वान पं. कमला प्रसाद मिश्र को दिए गए प्रथम हिंदी महापरिषद पुरस्कार- 1992 की स्मारिका के रूप में प्रकाशित किया गया है ।

फीजी में हिंदी भाषा के प्रचार की एक नयी दिशा और उपलब्धि यह भी है कि यहां की संसद ने यह स्वीकार किया है कि यहां के स्कूलों की हर परीक्षा में हिंदी भी एक विषय हो । इसके लिए नये पाठ्यक्रम बनाए जा रहे है । यहां यह उल्लेख कर देना भी आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है कि यहां की संसद के दोनों सदनों में हिंदी भाषा के प्रयोग को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है । प्रत्येक संसद-सदस्य अंग्रेजी, हिंदी और फीजियन भाषा के प्रयोग के लिए स्वतंत्र है ।

फीजी में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का निरंतर कार्य करने में रामायण मंडलियों व महिला मंडलियों का योगदान सराहनीय है । ये मंडलियां गांव-गांव में साप्ताहिक बैठकों का आयोजन करती हैं । इन बैठकों में आने वाले लोग आपस में हिंदी भाषा में ही बातें करते है । तुलसीकृत रामायण का सस्वर पाठ होता है । निश्चय ही इस प्रकार के आयोजनों से नयी पीढ़ी को भी हिंदी भाषा का संस्कार प्राप्त होता है । त्यौहारों के अवसरों पर यहां विभिन्न प्रकार के आयोजन होते है । सभाएं होती है । मेले लगते है । बड़े पैमाने पर अधिवेशन आदि भी किए जाते है । इन सभी आयोजनों की कार्यवाही हिंदी भाषा में ही होती है । अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण निर्णय करने वाली औपचारिक बैठकों में भी हिंदी भाषा का प्रयोग होता है ।

चुनाव सभाओं में किए जाने वाले राजनीतिक भाषणों में हिंदी का प्रयोग चुनाव जीतने के लिए बड़ा राम-बाण सिद्ध होता है । चुनाव सभाओं के पोस्टर व प्रचार सामग्री भी हिंदी भाषा के प्रयोग के बिना अधूरी समझी जाती है ।

यहां रहने वाले दक्षिण भारतीय, पंजाबी या गुजराती भाइयों ने भी बिना झिझक के हिंदी भाषा को ही आपसी विचार विनिमय का माध्यम बनाया हुआ है । इसमें उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े होने का अहसास और भी प्रबल होता है । हिंदी को सभी ने अपना समझकर अपनाया हुआ है । हिंदी भाषा का प्रयोग करने या पढ़ने के लिए किसी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता यहां नहीं है । यहां कोई नहीं कहता कि हिंदी उन पर लादी गयी है । वस्तुतः यहां हिंदी भाषा सभी प्रवासी भारतीयों के लिए अपनी अस्मिता की पहचान का पर्याय है ।

गांव-गांव में आज भी लोग चौपालों पर बैठते है और उनके बीच तरह-तरह के किस्से सुने-सुनाये जाते है । आल्हा गानेवाले को ऐसी चौपाल में बड़ा सम्मान मिलता है । कबीर के भजनों को गाने की प्रतियोगिताएं रात-रात भर चलती है । यहां की दुकानों में खरीददारी करते समय यदि आप हिंदी में बात करें तो भी आपको हर वस्तु तुरंत ही उपलब्ध करा दी जाएगी । यातायात के विभिन्न साधनों का उपयोग करते हुए भी हिंदी की उपयोगिता कम नहीं होती है । बस में ड़ाइवर-कंडक्टर तथा टैक्सी के ड्राइवर आदि सभी को हिंदी में अपना गंतव्य स्थल बताया जा सकता है । उससे टिकट खरीदा जा सकता है । किराया पूछा जा सकता है । वस्तुत: यहां की संपर्क भाषा हिंदी ही है ।

यहां ऐसी अनेक संस्थाएं है जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगी हुई है । इनमें श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन आदि ऐसी ही कुछ प्रमुख संस्थाएं है । फीजी में हिंदी के कार्य को समर्पित एक अन्य संस्था बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य करती रही है । इसका नाम है-हिंदी महापरिषद । सन् 1970 में फीजी की आज़ादी के साथ ही साथ इस संस्था का जन्म हुआ था । आज यह अपनी स्थापना के बारह वर्ष पूरे कर चुकी है । इन बारह वर्षों में यह संस्था निरन्तर कार्यरत रही । समय-समय पर इस संस्था ने काव्य गोष्ठियों का आयोजन किया है । फीजी के तीन प्रमुख जिलों में इसने हिंदी पुस्तकालय स्थापित किए हैं। नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर इस संस्था की ओर से एक प्रतिनिधि मंडल भारत आया था जो मारिशस के प्रतिनिधि मंडल के बाद सबसे बड़ा था।

फीजी में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयासों का भी उल्लेख करना आवश्यक है । भारत सरकार की ओर से फीजी के कुछ छात्रों को प्रतिवर्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान में एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम के लिए छात्रवृत्ति मिलती है। इससे फीजी का कुछ उपकार हुआ है । लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि उनमें से कुछ मेधावी छात्रों को हिंदी विषय से बीए, एम.ए. की डिग्री लेने के लिए लंबी अवधि तक चलने वाली छात्रवृत्तियां भी प्रदान की जायें।

हमारी सबसे बड़ी समस्या श्रेष्ठ व सुरुचिपूर्ण पुस्तकों के अभाव की है । भारत सरकार की ओर से प्रतिवर्ष कुछ पुस्तकें फीजी पहुंचती तो हैं। लेकिन बहुत बार उनमें संदर्भ-ग्रंथों की बहुतायत हो जाती है । फीजी के अल्पपठित लोगों के लिए गरिष्ठ नहीं, सुपाच्च और रुचिकर साहित्य की आवश्यकता अधिक है।

फीजी के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि इस प्रकार की लंबे समय तक चलने वाली स्थान-रिक्तता के कारण फीजी में हिंदी प्रचार-प्रसार के कार्य की गति में लगातार अवरोध पैदा हुआ है। यदि अन्य देशों में भी वह स्थिति होगी तो वहां भी ऐसा ही अवरोध आना स्वाभाविक है। इस लेख के माध्यम से मैं भारत सरकार से अनुरोध करूंगा कि यदि उसने विदेशों में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र निदेशकों, हिंदी अधिकारियों व प्राध्यापकों आदि के पद बनाए है तो उनकी नियुक्तियों में निरंतरता को भी बनाए रखा जाना चाहिए ताकि हिंदी प्रचार-प्रसार के कार्य की निरंतरता भंग न हो ।

फीजी में हिंदी के प्रसार के संदर्भ में एक अन्य प्रकार के अभाव की ओर भी आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा । फीजी में प्रचलित अन्य भाषाओं के विद्वानों व साहित्यकारों का आवागमन समय-समय पर होता रहता है लेकिन हिंदी भाषा को लालित्यमय गौरव देने वाले साहित्यकारों के दर्शनों से फीजी का हिंदी जनमानस आज भी वंचित है । मारिशस को यह सुयोग मिल गया कि राष्ट्रकवि दिनकर, जैनेंद्रकुमार, यशपाल, धर्मवीर भारती, भगवतशरण
उपाध्याय जैसे महान साहित्यकारों को वह अपनी भूमि पर अपने मध्य पा सका । फीजी में हिंदी अधिकारियों व संसद सदस्यों के दल तो बहुत गए लेकिन भारतीय साहित्यकारों के श्रीचरण अभी फीजी की धरती को नहीं छू पाए हैं । मेरी हार्दिक इच्छा है कि यहां के बड़े-बड़े साहित्यकार व भाषाविद् वहां आएं और अपने जीवन अनुभवों का अमृत फीजी के नवोदित साहित्यकारों को दें ताकि वे भी भारत से हजारों मील दूर रहकर मां भारती के मंदिर में अर्पित करने योग्य शब्द सुमन जुटा पाएं ।

- डॉ विवेकानंद शर्मा
[ साभार - गगनांचल, जनवरी-मार्च 1996]


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विशेष: यह आलेख कई वर्ष पहले 'भारत-दर्शन में प्रकाशित किया गया था व मूल आलेख गगनांचल 1996 में प्रकाशित हुआ था। फीज़ी में इस बीच अनेक परिवर्तन आए हैं यथा पाठक इस तथ्य का ध्यान रखें। फीज़ी में अब विश्वविद्यालय भी एक नहीं, तीन हैं। अधिक जानकारी के लिए आप फीज़ी के भारतीय उच्चायुक्त कार्यालय से सम्पर्क कर सकते हैं।

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