हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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ओ उन्मुक्त गगन के पाखी (काव्य) 
   
Author:मंजुल भटनागर

ओ उन्मुक्त गगन के पाखी
मेरे आंगन आ के देख

छत पर बैठ राह निहारूं
दाने मेरे कितने मीठे तू इनको खा के देख

दर्द बहुतेरे इस दुनिया में
तू खुशियों को फैला कर देख

जंगल में जब आग लगी हो
अपना नीड़ बचा कर देख

माँ की ममता कितनी न्यारी
यह बातें समझा कर देख

मेरी आँखे राह ताके
प्रीतम का पैगाम ले जाकर तो देख ।

- मंजुल भटनागर

 

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