मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।
 
जितने पूजाघर हैं | ग़ज़ल (काव्य)     
Author:राजगोपाल सिंह

जितने पूजाघर हैं सबको तोड़िये
आदमी को आदमी से जोड़िये

एक क़तरा भी नहीं है ख़ून का
राष्ट्रीयता की देह न निचोड़िये

स्वार्थ में उलझे हैं सारे रहनुमां
इनपे अब विश्वास करना छोड़िये

घर में चटखे आइने रखते कहीं
दूर जाकर फेंकिये या फोड़िये

इक छलावे से अधिक कुछ भी नहीं
कुर्सियों की ये सियासत छोड़िये

- राजगोपाल सिंह

 

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