जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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बदलीं जो उनकी आँखें (काव्य) 
   
Author:सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

बदलीं जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया ।
गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया ।

यह टहनी से हवा की छेड़छाड़ थी, मगर
खिलकर सुगन्ध से किसीका दिल बदल गया ।

ख़ामोश फ़तह पाने को रोका नहीं रुका
मुश्किल मुकाम, ज़िंदगी का जब सहल गया ।

मैंने कला की पाटी ली है शेर के लिए,
दुनियां के गोलन्दाजों को देखा, दहल गया ।

- निराला

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