वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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जै जै प्यारे भारत देश (काव्य) 
   
Author:महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi

जै जै प्यारे देश हमारे
तीन लोक में सबसे न्यारे ।
हिमगिरी-मुकुट मनोहर धारे
जै जै सुभग सुवेश ।। जै जै... ।।१।।

हम बुलबुल तू गुल है प्यारा
तू सुम्बुल,  तू देश हमारा ।
हमने तन-मन तुझ पर वारा
तेज पुंज-विशेष ।। जै जै ... ।।२।।

तुझ पर हम निसार हो जावें
तेरी रज हम शीश चढ़ावें ।
जगत पिता से यही मनावें
होवे तू देशेश ।। जै जै... ।।३।।

जै जै हे देशों के स्वामी
नामवरों में भी हे नामी ।
हे प्रणम्य तुझको प्रणमामी
जीते रहो हमेश ।। जै जै... ।।४।।

आँख अगर कोई दिखलावे
उसका दर्प-दलन हो जावे ।
फल अपने कर्मों का पावे
बने नामनि शेष ।। जै जै... ।।५।।

बल दो हमें ऐक्य सिखलाओ
सँभलो देश होश में आवो ।
मातृभूमि-सौभाग्य बढ़ाओ
मेटो सकल कलेश ।। जै जै... ।।६।।

हिन्दू मुसल्मान ईसाई
यश गावें सब भाई-भाई ।
सब के सब तेरे शैदाई
फूलो-फलो स्वदेश ।। जै जै... ।।७।।

इष्टदेव आधार हमारे
तुम्हीं गले के हार हमारे ।
भुक्ति-मुक्ति के द्वार हमारे
जै जै जै जै देश ।। जै जै... ।।८।।

- महावीर प्रसाद द्विवेदी

  अक्टूबर १९२०

[द्विवेदी काव्यमाला]

 

 

 

 

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