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एक चोरी अजीब-सी  (कथा-कहानी) 
   
Author:सुशांत सुप्रिय

यह कहानी सुनने के लिए आपको अपना काम छोड़ कर मेरे साथ रात के नौ बजे नुक्कड़ के ढाबे के भीतरी केबिन में चलना होगा जहाँ इलाक़े के चार-पाँच चोर और पॉकेटमार जमा हैं। जी हाँ, आपने सही पहचाना। मैं भी एक चोर हूँ। एक-दो दिन पहले हमारे इलाक़े के दादा ने कहीं तगड़ा हाथ मारा। उसी की ख़ुशी में आज रात दादा ने हम सब को खिलाने-पिलाने का वादा किया है। दादा चोर ज़रूर है लेकिन है दरियादिल आदमी।

अपनी खोली से निकल कर खुली नाली वाली बदबू भरी तंग गली से होता हुआ, मैं नुक्कड़ के ढाबे पर पहुँचता हूँ। बाहर बेंच और मेज़ पर मज़दूर और रिक्शावाले खाना खा रहे हैं। उनके बीच से होता हुआ, मैं ढाबे के भीतरी केबिन तक पहुँचता हूँ। भीतर से ठहाकों की आवाज़ आ रही है। ज़रूर दादा अपना कोई क़िस्सा सुना रहा होगा। दादा इस धंधे में बरसों से है। उसके पास क़िस्से-कहानियों का ख़ज़ाना है।

मैं केबिन का दरवाज़ा खोलकर भीतर पहुँचता हूँ।

"आ जा, राजू! तू भी आ जा। कहाँ रह गया था? " दादा सिगरेट का गहरा कश लेकर धुआँ ऊपर की ओर छोड़ता हुआ कहता है।

पम्मा, काले, छोटू और मुच्छड़-- सब जमा हैं। मेज़ पर दारू की बोतल खुली है। प्लेट में कुछ नमकीन पड़ा है। बग़ल में ताश के पत्ते बिखरे हुए हैं। सब के हाथों में गिलास हैं। कुछ भरे हुए, कुछ आधा ख़ाली।

मैं दादा को सलाम करके कोने वाली ख़ाली स्टूल पर बैठ जाता हूँ।

दादा की आँखें सुर्ख़ हो गई हैं।

"ले, तू भी ले।" दादा कहता है।

मैं भी गिलास में दारू डालकर गला तर करता हूँ। मज़ा आता है।

"दादा, कुछ सुनाओ। अब तो राजू भी आ गया है।" प्लेट में से नमकीन उठा कर पम्मा कहता है।

दादा सिगरेट का एक गहरा कश लेकर मुस्कुराता है। फिर उसकी आँखें दूर कहीं खो जाती हैं।

"लो, सुनो! बात तब की है जब मैं पंद्रह-सोलह साल का था। इस पेशे में नया-नया आया था।" एक ही घूँट में गिलास की बची हुई दारू पी कर दादा बोलना शुरू करता है। उसकी आँखें अतीत की किसी कन्दरा में से हमारे लिए कुछ उठा लाई हैं। लीजिए, अब दादा की आवाज़ में ही उसकी कहानी सुनिए।

"एक बार मैं किसी घर में चोरी के इरादे से घुसा। रात का एक बज रहा था। अमावस की रात थी। चारों ओर झींगुर बोल रहे थे। पूरा घर घुप्प अँधेरें में डूबा था। मैंने बरामदा पार किया और दरवाज़े तक पहुँचा।

"ज़रा-सा धक्का देते ही दरवाज़ा खुल गया और मैंने ख़ुद को कमरे के भीतर पाया। अँधेरे में कुछ भी नहीं सूझ रहा था। मैं जेब से टॉर्च निकालता इससे पहले ही कमरे की बत्ती अचानक जल गई। दरवाज़े के पास चालीस-पैंतालीस साल का एक छह फ़ुट का हट्टा-कट्टा आदमी खड़ा था। मैं सकपका गया। "कौन हो तुम? चोरी करने आए हो? " रोबीली आवाज़ में उसने पूछा।

मैं इस पेशे में नया-नया आया था। कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ।

"साहब, ग़लती हो गई है। मुझे जाने दीजिए।" मेरे मुँह से निकला।

"सच-सच बता। चोरी करने आया है न? " उस आदमी ने कड़कती आवाज़ में फिर पूछा।

मुझे काटो तो ख़ून नहीं। और कुछ नहीं सूझा तो फिर बोला, " साहब, ग़लती हो गई। माफ़ कर दीजिए। जाने दीजिए।"

लेकिन उस आदमी ने डपट कर मुझे कहा, " चोरी करने आया है तो चोरी करके जा।"

यह सुनकर मैंने उसकी ओर हैरानी से देखा। कहीं वह पागल तो नहीं? देखने से तो ऐसा नहीं लग रहा था।

"यह आप क्या कह रहे हैं, साहब? ग़रीब आदमी से मज़ाक़ मत कीजिए। मुझे जाने दीजिए।" मैं बोला।

"स्साले! चोरी नहीं की तो बहुत मारूँगा और पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दूँगा।" एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए उसने कहा।

मैं हैरान-सा कमरे के बीचोंबीच खड़ा था। दिमाग़ काम नहीं कर रहा था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।

"मझे जाने दीजिए, साहब। माफ़ कर दीजिए।" मैंने एक बार फिर कोशिश की।

"तुझे समझ नहीं आ रहा, मैं क्या कह रहा हूँ? तू चोरी करने आया है न। तो जो भी चीज़ तुझे पसंद है, चुरा और चला जा।" आदमी अपनी बात पर अड़ा रहा।
कहीं ये ख़ुद भी कोई चोर तो नहीं? हो सकता है यह मकान इसका हो ही नहीं-- मेरे दिमाग़ में कौंधा। पर जिस हक़ से यह मुझे यहाँ चोरी करने के लिए कह रहा है उससे तो लगता है कि यही इस घर का मालिक है।

"मुझे क्या है।" मैंने सोचा। जब यह इतनी ज़िद कर रहा है तो कुछ उठा कर यहाँ से खिसक लेता हूँ। कहीं इसका इरादा बदल गया और इसने पुलिस बुला ली तो?

"मैंने कमरे में इधर-उधर निगाह दौड़ाई। मेज़ पर एक सुनहरा लाइटर पड़ा था। मैंने उस आदमी की ओर देखा। उसने ऐसा जताया जैसे उसे लाइटर चुराए जाने पर कोई एतराज़ नहीं हो। मैंने लपक कर लाइटर उठाया और जेब में डाल लिया। वह दरवाज़े से हट कर कमरे के बीचोबीच आ गया और मैं खिसकता हुआ दरवाज़े तक पहुँच गया। जो कुछ हो रहा था उस पर मुझे अब भी यक़ीन नहीं आ रहा था।

"दरवाज़े पर पहुँच कर मुझसे रहा नहीं गया और आख़िर मैंने उस आदमी से पूछ ही लिया, "साहब , एक बात तो बताइए। अगर लोग किसी चोर को पकड़ते हैं तो उसे मारते-पीटते हैं। शोर मचाते हैं। पुलिस को बुलाते हैं। पर आप पहले आदमी होंगे जो अपने ही घर में चोर से चोरी करने के लिए कह रहे हैं। यह बात कुछ समझ नहीं आई।"

"यह सुनकर वह आदमी थोड़ा भावुक हो गया। कहने लगा, " तुम नहीं जानते, पिछले बीस सालों से मैंने अपने ख़ून-पसीने की गाढ़ी कमाई से घर की एक-एक क़ीमती चीज़ ख़रीदी है। फ़्रिज, टी. वी., सोफ़ा, डाइनिंग-टेबल ...। मैंने इस घर के लिए, अपनी बीवी के लिए क्या नहीं किया। लेकिन वह है कि रात-दिन मेरे हर काम में खोट निकालती रहती है। उसकी बातें सुन-सुन कर मेरे कान पक गए हैं। दिन-रात कहती रहती है, " इस चीज़ में यह ख़राबी है। यह सामान तुम घटिया उठा लाए हो। तुम्हें सामान ख़रीदना आता ही नहीं। तुम किसी लायक हो ही नहीं। बेकार सामान उठा लाते हो। ऐसे कबाडड़ को तो कोई चोर भी नहीं चुराएगा...।"

"यह सुनते ही सारी बात मेरी समझ में आ गई। मैं मुस्कुराया और उस आदमी को कमरे के बीचोबीच खड़ा छोड़कर मैं धीरे से मकान से बाहर खिसक लिया। रास्ते में देर तक मैं हँसता रहा।" यह कह कर दादा ने ठहाका लगाया और कुर्ते की जेब से एक लाइटर निकाल कर मेज़ पर रख दिया। पम्मा, काले, छोटू और मुच्छड़ एक आवाज़ में बोले, " क्या यह वही लाइटर है, दादा?
"
दादा ने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिलाया।

मेज़ से लाइटर उठा कर मैंने उसे उलटा-पलटा। उसका सुनहरा रंग अब फीका पड़ चुका था। मैंने जेब से सिगरेट निकाल कर लाइटर की मदद से सुलगा ली। लाइटर अब भी काम कर रहा था।

"दादा, हमें भी उस घर का पता बताओ न। हम तुम्हारी तरह सिर्फ़ लाइटर नहीं चुराएँगे।" काले ने हँस कर कहा।

"हाँ, हाँ, दादा। बताओ न। तुम तो हमारी अपनी बिरादरी के हो। तुम्हारे बहाने हमारा भी कुछ भला हो जाएगा।" पम्मा और छोटू भी बोले।

दादा की आँखें दोबारा दूर कहीं खो गईं। उनमें कई परछाइयाँ तैरने लगीं।

"लड़को, यह बात सही है कि हम सब एक ही बिरादरी के हैं, पर हमारे धंधे के भी कुछ उसूल होते हैं। जिस आदमी ने मेरे साथ ऐसा भला बर्ताव किया, मैं उसका और नुक़सान नहीं कर सकता। तुम सब कुछ भी कह लो, उसका पता तो मैं किसी को नहीं बताऊँगा।" दादा ने एक-एक शब्द पर बल देते हुए कहा।

हम सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।

- सुशांत सुप्रिय, भारत
  ई-मेल : sushant1968@icloud.com

 

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