हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर

Find Us On:

English Hindi
हैं खाने को कौन (काव्य) 
   
Author:गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

कुछ को मोहन भोग बैठ कर हो खाने को 
कुछ सोयें अधपेट तरस दाने-दाने को
कुछ तो लें अवतार स्वर्ग का सुख पाने को 
कुछ आयें बस नरक भोग कर मर जाने को 
श्रम किसका है, मगर कौन हैं मौज उड़ाते 
हैं खाने को कौन, कौन उपजा कर लाते?

- त्रिशूल [पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही']
[1921]

विशेष:  पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' सनेही नाम से ये परंपरागत और रससिद्ध कवितायें करते थे और त्रिशूल उपनाम से ये समाजसुधार और स्वाधीनता प्रेम की कविता किया करते थे।  

Previous Page  | Index Page  |    Next Page
 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश