जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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मीठा झगड़ा (बाल-साहित्य )

Author: प्रणेन्द्र नाथ मिश्रा

अकड़ के बोली गोल जलेबी, मुझसा कौन रसीला ?
मुझको चाहे सारी दुनिया, गाँव, शहर, क़बीला !

रबड़ी बोली , चुप कर झूठी! मुझको क्या बतलाती,
मुझको पाकर सारी दुनिया, बर्तन चट कर जाती !

काला जाम हँसा हो-हो कर, नहीं मिसाल हमारी,
जिसका काला रंग हो उसपर, मरती दुनिया सारी !

सावन के बादल हैं काले, काले कृष्ण हैं, काले राम,
जितना काला उतना मीठा, सबसे बढ़िया काला जाम !

रसगुल्ले ने देखा सबको, हलकी सी मुस्कान भरी,
मुझे चाहते राजा-रानी, बच्चे, बूढ़े और परी !

दूध बीच में आकर बोला, मत अब करो बड़ाई,
मेरे ही कारण तुम सबने, अपनी शान बढ़ाई !

मेरे घी में तली जलेबी, मुझसे बनती रबड़ी,
काला जाम बने खोये से, क्यों डींग हांकता तगड़ी !

मुझसे ही छेना बनता है, छेने से रसगुल्ला,
क्यों बघारते हो तुम शेखी, यूं ही खुल्लमखुल्ला !

मैं हूँ पिता तुम्हारा तुम सब मुझको करो प्रणाम,
मिलकर रहना भाई, बहनों, जाओ करो आराम !

-प्रणेन्द्र नाथ मिश्रा
pnmmnp@gmail.com

 

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