भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु'।

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दावत की अदावत  (कथा-कहानी)

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Author: अन्नपूर्णानंद वर्मा

यह मैंने आज ही जाना कि जिस सड़क पर एक फुट धूल की परत चढ़ी हो, वह फिर भी पक्की सड़क कहला सकती है। पर मेरे दोस्त झूठ तो बोलेंगे नहीं। उन्होंने कहा था कि पक्की सड़क है, साइकिल उठाना, आराम से चले आना।

धूल भी ऐसी-वैसी नहीं। मैदे की तरह बारीक होने के कारण उड़ने में हवा से बाजी मारती थी। मेरी नाक को तो उसने बाप का घर समझ लिया था। जितनी धूल इस समय मेरे बालों में और कपड़ों पर जमा हो गई थी, उतनी से ब्रह्मा नाम का कुम्हार मेरे ही जैसा एक और मिट्टी का पुतला गढ़ देता।

पाँच मील का रास्ता मेरे लिए सहारा रेगिस्तान हो गया। मेरी साइकिल पग-पग पर धूल में फँसकर खुद भी धूल में मिल जाना चाहती थी। मैंने इतनी धूल फांक ली थी कि अपने फेफड़ों को इस समय बाहर निकालकर रख देता तो देखने वाले समझते कि सीमेंट के बोरे हैं।
खैर, किसी तरह वह सड़क खत्म हुई और मैं एक लंबी पगडंडी तय करके उस बाग के फाटक पर पहुँचा, जिसमें आज मेरी मित्र-मंडली के सुबह से ही आकर टिकी थी।

फाटक पर खड़े होकर मैंने अपने को झाडा-झटकारा। जरूरत थी फावड़े की पर मैंने हाथ हे से अपने शरीर की धूल हटाई।

मैं बिलकुल लस्त हो गया था। धूल की वैतरणी पार करने के बाद यह बाग स्वर्ग-सा प्रतीत हो रहा था। हृदय धीरे-धीरे आनंद की पेंग मारने लगा। बारह बज गए थे, मित्रों ने रसोई तैयार कर ली होगी, मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। पता नहीं बाटियों को लोगों ने घी में तर कर रखा है या नहीं। मैंने कह तो दिया था।

बाग में मैं दाखिल हुआ। बीच में एक बारहदरी थी। चांडाल-चौकड़ी वहीं जमी होगी। मैं उसी तरफ बढ़ा। मन में सोचता जा रहा था कि एक बार पहुंचते ही सबको खूब लताड़ूंगा कि दावत देने की आखिर यह कौन-सी जगह थी। शहर से इतनी दूर और ऐसी खराब सड़क!
लेकिन बारहदरी में कोई दिखाई न पड़ा। किसी पेड़ के नीचे सब होंगे।

मैंने सारा बाग छान डाला, कहीं किसी की गंध भी न थी। आखिर मामला क्या है? दूर एक माली कुछ काम करता दिखाई पड़ा। उसके पास जाकर मैंने पूछा, "क्यों भाई! आज सुबह शहर से कुछ लोग यहाँ सैर के लिए आए थे?"

"नाहीं तो", उसने कहा।

"अरे मुरारी नाम का कोई आदमी नहीं आया था? इकहरा बदन, साँवला रंग, गाल पर एक बड़ा-सा मस्सा।"

"नाही, कोई नहीं आवा रहा।"

"मुरली नाम का कोई आदमी? लंबा कद, चपटी नाक, घूरे पर पड़े हुए जूते-सा मुँह है। "

"नाही"

"और माधो नाम का? "

उसने झुंझलाकर कहा, "नहीं साहब! माधो नाम का कोई नहीं आवा रहा, और मुन्नू, मंगही, मँगरू, मेवा, मोहन, मुनेसर नाम का भी कोई नाहीं आवा रहा। "

मैं अपना सिर पकड़कर वहीं बैठ गया। मैं फिर बेवकूफ़ बना, इसी एक साल में तीसरी बार।

पहली बार, गंगा में नाव पर इन बदमाशों ने मुझे दावत के लिए बुलाया और भाँग पिलाकर सोता हुआ छोड़कर भाग गए। दूसरी बार, खुद सब खा-पीकर मुरारी के मकान पर आए थे, मुझे दावत के नाम पर वहीं रोके रखा, पास के किसी कमरे में जलते तवे पर पानी के छींटे दे-देकर मुझे भुलावा दिया कि खाना तैयार हो रहा है। अंत में रात के बारह बजे मैं खाली पेट रोता-कलपता घर लौटा।

और, आज यह तीसरी बार। गरमी का दिन, दोपहर का समय, शहर से कोसों दूर और ऐसी खराब सड़क !

मैंने उस माली से कहा, "जरा पाँच मिनट के लिए अपने कानों में उँगली तो दाल लो।"

"काहे - उसने चकित होकर पूछा।

"अपने दोस्तों को मैं गाली दूंगा।"

"साहब, फजूल हमारा बखत ख़राब मत करो।"

"तुम कर क्या रहे हो?"

"इहै पेड़ हम उखाड़ रहा है।"

"लाओ मैं उखाड़ दूँ।"

मेरे एक झटके में पेड़ जड़ से उखड गया। मैंने यह सोच कर जोर लगाया था की अपने दोस्तों के कान उखाड़ रहा हूँ।

रोता-झींकता मैं उसी ‘पक्की‘ सड़क से लौटा। मैं था साइकिल पर सवार पर यदि साइकिल ही मेरे ऊपर सवार होती, तब भी आगे बढ़ने में मुझे इससे अधिक ज़ोर न लगाना पड़ता। धूप की तेजी के साथ - साथ हवा भी तेज़ हो गई थी। धूल की बहार इस समय मैं आँखों से कम, आँखों में ही अधिक देख रहा था।

साढ़े तीन बजे के करीब मैं शहर पहुंचा। मैं थकावट और भूख से मुर्दा हो रहा था। पर इस समय मुझे सिर्फ़ एक ही धुन थी - मुरारी को पकड़कर पीटने की। वही ऐसी शरारतों का आविष्कारक और सूत्रधार होता है।

मैं सीधा मुरारी के मकान पर पहुँचा। उसके छोटे भाई से भेंट हुई। मैंने पूछा, "मुरारी है?"

"नहीं।"

"कहाँ गया?"

"मैं नहीं जानता।"

"मर गया हो तो साफ-साफ बता दो, मैं हँसी-खुशी घर जाऊँ।"

"आप बहुत थके-माँदे जान पड़ते हैं। जल पीजिएगा?"

"मैं इस समय मुरारी के खून का प्यासा हूँ। आए तो उससे कह देना।"

पास ही में मुरली का मकान था। वहाँ गया, वह भी न मिला। माधो से भी भेंट न हुई। मैं समझ गया कि सब-के-सब जानबूझकर कहीं छिपे हुए हैं। यह तो वे सब जानते ही होंगे कि इस समय मैं बनैले सुअर से भी ज्यादा खतरनाक हो रहा था।

मैं अपने मकान की ओर चला। रास्ते में पंडित नेकीराम से भेंट हो गई। वे इसी जिले में बी. एन. डबल्यू रेलवे के राहुलगंज नामक स्टेशन के स्टेशन-मास्टर हैं। मेरा कुछ एहसान उनके ऊपर था, इससे मेरा लिहाज करते थे।

नमस्कार-प्रणाम के बाद मैंने पूछा, "कहिए, कहाँ जा रहे हैं?"

"दो महीने की छुट्टी माँगी थी, जो मंज़ूर हो गई है। एक हफ्ते में घर जाने वाला हूँ। आज कुछ सामान खरीदने शहर आया था। आप तो कभी आते ही नहीं, कई बार प्रार्थना की कि एक रात वहीं बसेरा कीजिए।"

"अच्छा आऊँगा। हो सका तो आपके जाने से पहले आऊँगा।"

उस समय मैं भूखा-प्यासा अधिक बातें नहीं कर सकता था। मैं किसी तरह गिरता-पड़ता घर पहुंचा।

तीन दिन तक मुरारी, मुरली, माधो या मोहन किसी की सूरत न दिखी। चौथे दिन सब-के-सब एक साथ ही मेरे मकान पर आए। पूर्व इसके कि मेरा पारा चढ़े, उन सबने हँसना शुरु किया और ईश्वर झूठ न कहलाए, पंद्रह मिनट तक लगातार हँसते रहे। मैं खड़ा दांत पीसता रहा।

मुरारी ने हँसते हुए कहा, "देखो, जब तक तुम हम लोगों को एक दावत न दोगे, तब तक हम लोग तुम्हें इसी तरह बेवकूफ बनाकर छकाया करेंगे।"

किसी तरह अपना गुस्सा पीते हुए मैंने कहा, "अपने घर पर तो मैं तुम लोगों को दावत दे नहीं सकता। मेरी पत्नी तुमलोगों को समाज की तलछट समझती है।

"अच्छा ! बाहर कहीं !"

राहुलगंज चलोगे? छोटी लाइन से तीन स्टेशन हैं। बड़ा रमणीक स्थान है। वहाँ के स्टेशन-मास्टर मेरे मित्र हैं। दावत का सारा प्रबंध कर रखेंगे।

मेरी यह राय सबको पसंद आई। अगले दिन ही वहाँ चलने की पक्की ठहरी। दूसरे दिन शाम को पांच बजे की गाड़ी से हम लोग रवाना हुए और छह बजते-बजते राहुलगंज पहुँच गए।

पंडित नेकीराम मेरे साथ इतने आदमियों को देखकर घबरा गए। उन्हें अलग ले जाकर मैंने उनसे कुछ बातें कीं। वे हँसकर चुप रहे ।

मैंने पूछा, "आप कल सुबह जा रहे हैं?"

"कल सुबह नहीं, बल्कि आज ही रात तीन बजे की गाड़ी से। मेरी जगह काम करने वाले आ गए हैं। कल से मेरी छुट्टी शुरू होगी।"

इधर मुरारी और मोहन में बहस हो रही थी कि आसन कहाँ जमाया जाए। मुरारी प्लेटफ़ॉर्म पर ही दरी बिछाकर बैठना चाहता था। मोहन की राय थी कि सामने कुएँ की जगत पर बैठकर जमे। पर मैंने जो राय दी, वह अपनी नवीनता के कारण सबको पसंद आई।

स्टेशन बगल में और रेल की पटरियों से कुछ फासले पर पानी की टंकी थी। जमीन से करीब 40 फुट की ऊँचाई पर यह लोहे के खम्भों के ऊपर बिठाई हुई थी। चढ़ने के लिए बगल में लोहे की पतली सीढ़ी रखी थी। टंकी ऊपर से ढकी हुई थी।

मैंने कहा कि क्यों न इस टंकी पर चढ़कर बैठा जाए। चांदनी रात में बड़ा मज़ा रहेगा। चारों ओर से हवादार जगह, फिर नीचे से पानी की तरी। पास में पेड़ों का झुरमुट होने के कारण कोई देखेगा भी नहीं।

बस यही ठीक रहा । मेरी सूझ की सबने तारीफ की । टंकी पर एक दरी बिछा दी गई और मित्र मंडली उस पर जा धमकी। कहकहों का बाजार गर्म हुआ, गुलछर्रे उड़ने लगे । दो-ढाई घंटे तो देखते-देखते बीत गए। नौ बजे लोगों की राय हुई कि अब खाना खाना चाहिए। ऊपर ही खाया जाएगा। मैं प्रबंध करने के लिए नीचे भेजा गया।

पंडित नेकीराम अपने कमरे में स्टेशन पर बैठे हुए थे। मैंने जाकर कहा, "पंडितजी, अब कोई आदमी दीजिए जो सीढ़ी गिराने में मेरी मदद करे। लेकिन पहले एक घड़ा पानी पीने के लिए ऊपर रखवा दीजिए, गरमी का दिन है।"

पंडितजी ने अपना नौकर मेरे साथ किया। नौकर जिस समय पानी का घड़ा लेकर टंकी पर चढ़ा उस समय दोस्तों ने समझा कि अब भोजन भी आता होगा। लेकिन नौकर ने उतरकर, मेरी मदद से लोहे की सीढ़ी खिसकाकर धीरे-से नीचे गिरा दी।

मैं नीचे बैठकर तमाशा देखने लगा। करीब आधा घंटा लोगों ने प्रतीक्षा की। फिर यह राय हुई कि कोई नीचे उतरकर देखे कि भोजन पहुँचने में देर क्यों हो रही है। मुरारी नीचे उतरने के लिए खड़ा हुआ।

पर यह क्या? सीढ़ी कहाँ गायब हो गयी? मुरारी ने झुककर देखा तो सीढ़ी जमीन पर गिरी हुई दिखाई पड़ी।

उस छोटी-सी दुनिया में जो इस समय पानी की टंकी पर स्थित थी, एक क्रांति-सी पैदा हो गई। मुझे अभी तक इसका खेद है कि काफी प्रकाश न होने के कारण मैं अपने मित्रों का चेहरा अच्छी तरह नहीं देख पाया था। शोर काफी सुनाई पड़ रहा था।

मैंने नीचे से पूछा, "क्या है मुरारी? क्या शोर कर रहे हो?"

"अजी, यहाँ की सीढ़ी कैसे गिर गई? हम लोग नीचे कैसे उतरेंगे?"

"नीचे उतरने की ज़रूरत क्या है? अब सवेरे नीचे उतरना। बड़े भाग्य से ऐसा उच्च स्थान प्राप्त होता है।"

"फजूल मत बको!"

"देखो, चाँदनी खिली हुई है। शीतल-मंद-सुगंध बयार बह रही है। ऊपर निर्मल निरभ्र आकाश का वितान है, नीचे हरी-भरी पृथ्वी का प्रसार है।"

"अच्छा चुप रहो।"

"आदर्श ऋतु है, सुन्दर स्थान है, मनोरम दृश्य है। इससे अधिक क्या चाहिए? निश्चित होकर प्रकृति का निरीक्षण करो!"

"तुम न मानोगे?"

"अच्छा, कविता करो, या कहानी कहो, रात कट जाएगी। सोचो कि इस समय तुम लोग स्वर्ग के कितने निकट हो?"

मैने पंडित नेकीराम के नौकर से कह दिया था। वह एक हाथ में लालटेन और दूसरे में मेरे लिए थाली लेकर आ पहुंचा। मैं वहीं बैठकर खाने लगा। मोहन ने ऊपर से कहा, "अजी, हम लोग क्या खाएँगे?"

मैंने कहा,"क्या बताऊँ? बड़ा अफ़सोस है! इसी अफ़सोस में मैं आज कुछ ज्यादा खा रहा हूँ!"

"मर जा खाते-खाते" मोहन ने कहा।

"यह कचौड़ी बड़ी लाजवाब बनी है। कहो तो मैं एक टुकड़ा तुम लोगों को देखने के लिए ऊपर फेंकूँ?"

इसका मुझे कोई उत्तर न मिला, पर कराहने की आवाज़ मुझे साफ़ सुनाई दी। मैंने फिर कहा, "अजी, रबड़ी की खुशबू से तो दिल हरा हो गया। तुम लोगों तक इसकी खुशबू पहुँच रही है या नहीं?"

इस बार भी मुझे कोई उत्तर न मिला। मैंने अपनी निगाह ऊपर उठाई। आपने अँधेरे में किसी बिल्ली की आँखें चमकती हुई देखी हैं? ठीक उसी तरह की चार जोड़ी आँखें टंकी के ऊपर से मेरी ओर आग फेंक रही थीं।

खाना ख़त्म करके मैं वहाँ से चलने लगा। चलते हुए मैंने कहा, "ऊपर एक घड़ा पीने का पानी मैंने रखवा दिया है। खाली पेट ठंडा जल आयुर्वेद में त्रिदोषनाशक माना गया है।"

थोड़ी दूर जाकर मैं फिर लौटा। एक बात मैं भूल गया था। मैंने कहा, "हाँ, एक बात और। पंडित नेकीराम ने कहा कि रात में अगर किसी ने शोर किया तो वे पुलिस को खबर दे देंगे कि कुछ बाहरी लोग बिना इज़ाज़त स्टेशन की टंकी पर चढ़ गये हैं और ऊधम मचा रहे हैं।"

"तुम्हारा संहार हो," मुरारी और मोहन ने कहा।

"तुम्हारा सत्यानाश हो" मुरली और माधो ने कहा।

ग्यारह बज गए थे। राहुलगंज ब्रांचलाइन का स्टेशन है। रात में गाड़ियाँ नहीं आतीं-जातीं। स्टेशन पर इसलिए शांति थी।

सुबह साढ़े तीन बजे की गाड़ी से पंडित नेकीराम रवाना हो गए। मैं भी उसी गाड़ी से रवाना हुआ। पंडित जी ने नए स्टेशन मास्टर से, जो उनके मित्र थे, चलते समय कह दिया कि कुछ मेहमान पानी की टंकी पर सो रहे हैं, इन्हें सुबह छह बजे की गाड़ी के समय से पहले ही सीढ़ी लगाकर उतार दीजिएगा।

घर आकर मैं कई दिन तक बाहर नहीं निकला। मुरारी वगैरह आते थे। और हाथ मलकर लौट जाते थे।

- अन्नपूर्णानंद वर्मा

 

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