वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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लंच! प्रपंच!! (काव्य)

Author: मधुप पांडेय

आगंतुक ने चिढ़कर
बड़े बाबू से कहा -
"अजीब प्रपंच है!
मैं जब भी आता हूं,
क्लर्क कहता है--
श्रीमान, अभी ‘लंच' है।
समझ नहीं पाता हूं
मेरे आने का समय
गलत या सही है।
क्या आपके यहां
लंच का कोई
निश्चित समय नहीं है?"
उत्तर मिला--" श्रीमान,
जब भी कोई आगंतुक
‘लंच' का प्रस्ताव लाता है।
हमारे ऑफिस में
तुरंत उसी समय
‘लंच' का समय हो जाता है!"

-मधुप पांडेय
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