वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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आज कैसी वीर, होली? (काव्य)

Author: क्षेमचन्द्र 'सुमन'

है उषा की पुणय-वेला
वीर-जीवन एक मेला
चल पड़ी है वीर युवकों, की नवल यह आज टोली?
आज कैसी वीर, होली?

मातृ-बन्धन काटने को
ध्येय पावन छाँटने को
बाँटने को शत्रु-संगर में, अनोखी लाल रोली !
आज कैसी वीर होली?

जा रहे हैं क्यों सुभट ये
और भोले निष्कपट से
आज करने प्रियतमा से, जेल में निज प्रेम-होली!
आज कैसी वीर होली?

- क्षेमचन्द्र 'सुमन', १६ मई' ४३

[ साभार: बन्दी के गान ]

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