दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ

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राजनैतिक होली (काव्य)

Author: डॉ एम.एल.गुप्ता आदित्य


चुनावों के चटक रंगों सा, छाया हुआ खुमार ।

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


अपनी-अपनी टोली में निकले, होली के मतवाले ।

खम ठोक रहे सब, हम ही उजले कपड़ों वाले।।

आरोपों के गुब्बारों से करते, इक दूजे पर वार ।

रंग अलग है, ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


इस बार कमल की टोली में, चायवाले छाए हैं ।

मुरली और अडवाणीजी, घर पर ही लेट लगाए हैं।।

सबके रंग उड़ानेवाले पर, केजरी ने कर दी बौछार ।

रंग अलग है, ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


उड़ता कहीं नीला-हरा, कहीं केसरिया कहीं लाल ।

राजनीति के रंगों सा, नेता नित उड़ा रहे गुलाल ।।

आपवाले आपस में ही, खेलते होली लट्ठमार ।

रंग अलग है, ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


पिचकारी को छोड़ केजरी ने, झाड़ू अपना निकाला,

दिल्ली में कर दी ऐसी सफाई, कोई बचा नहीं रंगवाला

तीसरी टोली ले ढपली, फिर आ गई इक बार ।

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


फाल्गुन आया तो अन्ना पर, फिर से चढ़ा खुमार, ।

चलों की टोली में, होली, खेले रहे इस बार ।।

होली में रूठ कर चले गए, जाने कहाँ राजकुमार ।

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


लालू के घर मुलायम आए, बनाके अपनी टोली,

समधी बन दोनों ने खेली, यूपी-बिहार की होली।

मोदी भा ले रंग केसरिया, पहुंचे मुलायम के द्वार।

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


नितीश ने मांझी को मोहल्ले से ही भगाया है,

मेरी सत्ता-रानी से बता, तूने क्यूं इश्क लड़ाया है,

उससे तो हम ही खेलेंगे, होली अबकी बार

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।


फैंक के कीचड़ इक-दूजे पर, नेता करते हैं ठिठोली।

चुनाव आयोग टोके तो कहते, होली है भई होली ।।

ढोल पीट चिल्लाते हर दिन, मेरी जीत तेरी हार,

रंग अलग है ढंग अलग है, होली का इस बार ।।

- डॉ एम.एल.गुप्ता ‘आदित्य'

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