राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

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विश्वनाथ प्रताप सिंह की दो क्षणिकाएँ  (काव्य)

Author: विश्वनाथ प्रतापसिंह

लिफाफा

पैगाम तुम्हारा
और पता उनका
दोनों के बीच
फाड़ा मैं ही जाऊँगा।

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झाड़न

पड़ा रहने दो मुझे
झटको मत
धूल बटोर रखी है
वह भी उड़ जाएगी।

- विश्वनाथ प्रतापसिंह

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