हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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मन में रहे उमंग तो समझो होली है | ग़ज़ल (काव्य)

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Author: गिरीश पंकज

मन में रहे उमंग तो समझो होली है
जीवन में हो रंग तो समझो होली है

तन्हाई का दर्द बड़ा ही जालिम है
प्रिय मेरा हो संग तो समझो होली है

स्वारथ की हर मैल चलो हम धो डालें
छिड़े अगर यह जंग तो समझो होली है

मीठा हो, ठंडाई भी हो साथ मगर
थोड़ी-सी हो भंग तो समझो होली है

निकले हैं बाहर लेकिन क्यों सूखे हैं
इन्द्रधनुष हो अंग तो समझो होली है

दिल न किसी का कोई यहाँ दुखाए बस
हो सुंदर ये ढंग तो समझो होली है

तन में रंग और भंग हो ज़ेहन में
पूरा घर हो तंग तो समझो होली है

दुश्मन को भी गले लगाना सीख ज़रा
जागे यही उमंग तो समझो होली है

रूखी-सूखी खा कर के भी मस्त रहो
बाजे मन का चंग तो समझो होली है

इक दिन सबको बुढऊ होना है 'पंकज'
दिल हो लेकिन 'यंग' तो समझो होली है

- गिरीश पंकज

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