हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

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हिन्दी भारत की भाषा (काव्य)

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Author: श्रीमती रेवती

भाषा हो या हो राजनीति अब और गुलामी सहय नहीं,
बलिदानों का अपमान सहन करना कोई औदार्य नहीं ।
रवि-रश्मि अपहरण करने को मत बढें किसी के क्रूर हाथ
इन मुसकाते जल-जातों को यह सूर्य ग्रहण स्वीकार्य नहीं ।

हिन्दी औरों की बोली है तो अंग्रेजी कब अपनी है?
अपनी इतनी भाषाओं से भी अंग्रेजी क्या वजनी है?
उत्तर-दक्षिण के भेद भाव मत बनै ऐक्य-पथ में बाधक,
रामेश्वर, सोमनाथ, अपने, हिन्दी ऐसे ही अपनी है ।

अपनी स्वतंत्र भारत भू में हम भाषा में परतंत्र रहें ।
हिन्दी, तमिल, बंगला आदि के रहते भी न स्वतंत्र रहें !
तो किस मुंह से फिर बात करें एकता और आजादी की,
अंग्रेज गए अब अंग्रेजी के कब तक बने गुलाम रहें ।

इसलिए कर्णधारों, हम को अब और न पीछे को खींचो,
अपनी केसर की क्यारी को अब और न पावक से सींचो ।
बढ़ना है हमें प्रगति-पथ पर भारत को भारत बनने दो,
जीवन-यथार्थ परिवेश देख अब और नहीं आँखें मीचो ।

हिन्दी भारत की भाषा है अपने कंठों की निज भाषा,
हिन्दी भाषा ही नहीं, कोटि जन-गण मन की है परिभाषा ।
अंग्रेजी से कह दो छोड़े गद्दी, समझे युग की है परिभाषा ।
सम्मानित हो निष्कपट भाव से, हिन्दी सब की है अभिलाषा ।

- श्रीमती रेवती

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