हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

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मेरी मातृ भाषा हिंदी  (काव्य)

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Author: सुनीता बहल

मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l
देश की है यह सिरमौर ,
अंग्रेजी का न चलता इस पर जोर l
विश्वव्यापी भाषा है चाहे अंग्रेजी,
हिंदी अपनेपन का सुख देती l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l


देवनागरी में लिखी जाती,
जैसी बोली वैसी लिखी जाती l
यही हमारी विश्वव्यापी है पहचान ,
हिंदी का हमे करना है सम्मान l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l

बड़ा ना छोटा अक्षर कोई ,
भेदभाव ना इसमें कोई l
शब्द का हर सही अर्थ है बताती ,
हर रिश्ते को अलग शब्दों में है समझाती l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l


तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली है यह भाषा ,
इसका सम्मान बढ़ाना है हमे सबसे ज्यादा l
इस श्रेष्ठ भाषा के है हम ज्ञाता ,
संस्कृत ,अरबी से इसका है गहरा नाता l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी ।


हिंदी नहीं किसी दिवस की मोहताज़ ,
करती है अब भी हर दिल पर राज l
निराशा का कोहरा अब है छंट गया ,
हिंदी भाषा का दौर फिर से आ गया l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l

-सुनीता बहल
[email protected]

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