राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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हिन्दी, भारत की सामान्य भाषा (विविध)

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Author: लोकमान्य तिलक

राष्ट्रभाषा की आवश्यकता अब सर्वत्र समझी जाने लगी है । राष्ट्र के संगठन के लिये आज ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जिसे सर्वत्र समझा जा सके । लोगों में अपने विचारों का अच्छी तरह प्रचार करने के लिये भगवान बुद्ध ने भी एक भाषा को प्रधानता देकर कार्य किया था । हिन्दी भाषा राष्ट्र भाषा बन सकती है । राष्ट्र भाषा सर्वसाधारण के लिये जरूर होनी चाहिए । मनुष्य-हृदय एक दूसरे से विचार-विनिमय करना चाहता है; इसलिये राष्ट्र भाषा की बहुत जरूरत है । विद्यालयों में हिन्दी की पुस्तकों का प्रचार होना चाहिये । इस प्रकार यह कुछ ही वर्षों में राष्ट्र भापा बन सकती है ।

मेरी समझ में हिन्दी भारत की सामान्य भाषा होनी चाहिये--यानी समस्त हिन्दुस्तान में बोली जाने वाली भाषा होनी चाहिये । निःसन्देह हिन्दी दूसरे कार्यों के लिये प्रान्तीय भाषाओं की जगह तो ले ही नहीं सकती । सब प्रान्तीय कार्यों के लिये प्रान्तीय भाषाएँ ही पहले की तरह काम में आती रहेगी । प्रान्तीय शिक्षा और साहित्य का विकास प्रान्तीय भाषाऔं के द्वारा ही होगा; लेकिन एक प्रान्त दूसरे प्रान्त से मिले, तो पारस्परिक विचार विनिमय का माध्यम हिन्दी ही होनी चाहिये; क्योंकि हिन्दी अब भी अधिकांश प्रान्तों में समझ ली जाती है और बोलने तथा
चिट्ठी लिखने लायक हिन्दी थोड़े ही समय में सीख ली जाती है । इस विषय में कोई प्रान्तीय भाषा हिन्दी का स्थान नहीं ले सकती ।

- लोकमान्य तिलक

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