राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।' - अनंत गोपाल शेवड़े

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यदि मैं तानाशाह होता ! (विविध)

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Author: बालकृष्ण राव

यदि मैं तानाशाह होता तो विदेशी माध्यम द्वारा शिक्षा तुरंत बंद कर देता, जो अध्यापक इस परिवर्तन के लिए तैयार न होते उन्हें बर्ख़ास्त कर देता, पाठ्य पुस्तकों के तैयार किए जाने का  इंतजार न करता ।' पिछले प्राय: एक पखवारे भर प्रयागनिवासी महात्मा गांधी के इन शब्दों को अपने नगर के अनेक स्थानों पर चिपके पोस्टरों पर लिखे देखते रहे हैं । उत्तर प्रदेश-शासन द्वारा जो 'भाषा विधेयक' विधानमंडल में प्रस्तुत हुआ था उसे ही इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि हम लोगों ने राष्ट्रपिता के इन शब्दों को याद करने-कराने की कोशिश की ।

शासन के इस प्रयास से जो चेतना जागृत हुई, स्वभाषा के अपमान की जो तीव्र प्रतिक्रिया हमारे मन में हुई, उसके फलस्वरूप ऐसा जान पड़ने लगा कि 'स्वदेशी आंदोलन' की तरह 'स्वभाषा आंदोलन' भी चल निकलेगा । प्रयाग ने इस स्वतःस्फूर्त अभियान में प्रदेश का नेतृत्व किया । एक सार्वजनिक सभा में विधेयक का विरोध किया गया, निश्चय किया गया कि विरोध को सक्रिय, सुसंघटित संघर्ष का रूप देने के लिए योजना-बद्ध कार्य किया जाए । एक 'हिंदी संघर्ष समिति' स्थापित हुई जिसके तत्वावधान में एक व्यावहारिक कार्यक्रम बना । निश्चित हुआ कि सितंबर 8 से एक 'विधेयक विरोधी सप्ताह' मनाया जाए जिसकी पूर्णाहुति हिंदी दिवस ( सितंबर 14 ) को एक सार्वजनिक सभा के रूप में हो । आंदोलन की एक विवरणिका  प्रकाशित हो, नगर के विभिन्न क्षेत्रों में सभाएँ की जाएँ, एक सबल संघात जनसमूह के मन और मस्तिष्क पर पड़े । शासन ने विधान परिषद में अपने विधेयक को प्रस्तुत करने के पहले ही विचार बदल दिया । इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति या वर्ग को देना ग़लत है : शासन का यह मत-परिवर्तन मूलत: सद्विवेक के सहसा जाग उठने का परिणाम था या संभाव्य जनविरोध की कल्पना का, यह कौन जाने । पर यह अस्वाभाविक नहीं था कि हिंदी वालों ने विधेयक की विभीषिका का हट जाना अपने अभियान की सफलता का प्रमाण माना ।

विधेयक के रद्द होने - या रद्द होना निश्चित हो जाने-- के बाद 'विधेयक विरोधी सप्ताह' मनाने की जरूरत नहीं रही । यह सहज स्वाभाविक जान पड़ता यदि 'संघर्ष समिति' एक औपचारिक बैठक कर के शासन को बधाई देती और अपनी कार्यसिद्धि पर प्रसन्न होकर 'खेल खत्म' का नोटिस लटका कर, दरवाज़े बंद कर देती । पर उसने किया कुछ और ही । उसने बधाई का संदेश तो मुख्य मंत्री के पास भेजा पर साथ ही यह भी निश्चय किया कि न अपना नाम बदलेगी न काम । विधेयक के विरोध में न सही, पर 'संघर्ष' जारी रखने की आवश्यकता अब भी थी-इस कारण समिति ने अपने कार्यक्रम को प्राय: पूर्ववत ही रखने का निश्चय किया । इसके अनुसार सप्ताह भर स्थान-स्थान पर सभाएँ हुई, पोस्टर चिपकाये गए, लेख लिखे-लिखवाये गए, हर  प्रकार से एक व्यापक, जीवंत 'हिंदी आदोलन' के अस्तित्व का बोध कराने के लिए उसके उपयुक्त वातावरण बनाने की चेष्टा की गयी । 'हिंदी दिवस' के दिन एक सार्वजनिक सभा श्री अमृतलाल नागर की अध्यक्षता में हुई जिसमें उपस्थित लोगों ने एक सामूहिक प्रतिज्ञा की कि हिंदी को उसका पद पूर्णरूपेण जब तक नहीं मिलेगा तब तक संघर्ष करते रहेंगे । सितंबर ८ से १४ तक (जिसे
'हिंदी सप्ताह' का नाम दिया गया था) जैसी सक्रियता परिलक्षित हुई थी यदि वैसी ही भविष्य में भी होती रही तो निश्चयपूर्वक एक ऐसी प्रेरक शक्ति उत्पन्न हो जाएगी जो जनभाषा को उसके अपेक्षित पद पर प्रतिष्ठित कराने में सफल होगी । हिदी का प्रश्न केवल लेखकों' और बुद्धिजीवियों का प्रश्न नहीं है, सामान्य जनता का प्रश्न है । विधेयक के विरोध में उठे आदोलन का वास्तविक मूल्य और महत्व यही है कि वह 'लेखकों और बुद्धिजीवियों की बेचैनी' बन कर नहीं रह गया । सच्ची बात तो यह है कि आरंभ से ही उसका रूप एक व्यापक जन आदोलन का ही रहा; जो  लेखक और बुद्धिजीवी इसमें सक्रिय सहायक हुए वे भी लेखक और बुद्धिजीवी होने के कारण नहीं बल्कि इस कारण कि हिंदी के आंदोलन को सामान्य हिंदीभाषी जनता का आंदोलन मान सके, सबके साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करने के लिए तैयार हो सके, लेखक और बुद्धिजीवी  होने के नाते अपने को एक विशिष्ट वर्ग के रूप में अलग रखने के मोहजाल से मुक्त हो सके । प्रयाग के आंदोलन में जिस प्रकार मुक्त रूप से राजनीतिक कार्यकर्ता, लेखक, व्यवसायी, वकील, क्लर्क और अन्य अनेक वर्ग एक-दूसरे के स्वर में स्वर मिला कर हिंदी की बात कह सके, अपने अनेक  पारस्परिक मतभेदों को भुला और दबा कर जिस प्रकार हिंदी के प्रश्न पर एकमत हो सके, वह  सचमुच स्तुत्य है । जो प्रयाग में संभव हो सका वह निश्चय ही अन्यत्र भी हो सकता है-और यदि हिंदी को अंग्रेज़ी का स्थान सचमुच लेना है तो हो कर ही रहेगा ।

प्रयाग के 'हिंदी सप्ताह' की अवधि में हुई अनेक सभओं और गोष्ठियों में से एक विशेष रूप से उल्लेखनीय है । सितंबर 12 को उत्तर प्रदेश के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष श्री राधा- कृष्ण के सभापतित्व में एक महत्वपूर्ण विचार-गोष्ठी हुई जिसमें ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में हिंदी को माध्यम के रूप में अपनाने के प्रश्न पर अधिकारी विद्वानों ने अपने मत प्रकट किए । भाग  लेने वालों में विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान तथा राजनीति शास्त्र और स्थानीय इंजीनियरिंग तथा मेडिकल कालेजों के प्राध्यापक और उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता थे । इस बात पर सभी एकमत थे कि विज्ञान अथवा औद्योगिकी के किसी भी क्षेत्र में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाने में ऐसी कोई भी दिक्कत नहीं है जो आसानी से दूर न की जा सके । सभी ने कहा कि पारिभाषिक शब्दों के समुचित पर्याय हिंदी में हों या न हों, हिंदी को वैज्ञानिक और औद्योगिक शिक्षा का माध्यम तुरंत बनाया जा सकता है--बशर्ते कि कोई सचमुच बनाना चाहे । लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ने अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर कहा कि ''सारे प्रयत्नों के बावजूद देश में अंग्रेज़ी का स्तर बराबर गिरता ही जा रहा है, और गिरता ही जाएगा । हम जितनी जल्दी इस बात को समझ और मान लें कि आगे बढ़ने के लिए हिंदी के सिवा कोई रास्ता नहीं है, उतना ही देश के लिए कल्याणकर होगा ।'' और शायद इन शब्दों से भी अधिक महत्वपूर्ण उनका यह कथन था कि ''स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेज़ी पर जितना बल कभी नहीं दिया गया था, उसके प्रचार- प्रसार-उन्नयन की जितनी कोशिश कभी नहीं की गयी थी, उससे कहीं अधिक स्वतंत्रता के बाद से की जाने लगी है ।" सबसे बड़े हिंदी-भाषी प्रदेश के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के ये शब्द-सो भी स्वतंत्रता-प्राप्ति के 17 और हिंदी को राजभाषा बनाने के संकल्प के 14 वर्ष बाद - और उधर , सुदूर नेपथ्य से आती हुई महात्मा गांधी की आवाज़: ''यदि मैं तानाशाह होता तो... '' ।

 

यह निश्चय ही दुख की बात है कि देश के कर्णधार अब तक यही न समझ पाए कि अंग्रेज़ी के महत्व को घटाना हमारे लिए इस समय एक अनिवार्य आवश्यकता है-क्योंकि अभी हमें स्वतंत्र हुए इतने दिन नहीं हुए कि अंग्रेज़ी के प्रति हमारी दृष्टि वैसी ही स्वस्थ, संतुलित और स्पष्ट हो सके जैसी अन्य विदेशी भाषाओं के प्रति सहज ही हो सकती है । माना कि अंग्रेज़ी आज संसार में प्राय: सर्वाधिक उपयोगी भाषा हो गयी है, पर इसका न यह अर्थ है कि प्रत्येक भारतीय के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है और न यही कि प्रत्येक अंग्रेज़ी जानने वाले भारतीय को अपने सामान्य, दैनंदिन जीवन में अंग्रेज़ी का उपयोग करना चाहिए । अंग्रेज़ी की अनिवार्य शिक्षा, अंग्रेज़ी के अध्ययन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के प्रयत्न, प्रशासकीय कार्य में अंग्रेज़ी का उपयोग--इन में से किस चीज़ की इस कारण जरूरत है कि अंग्रेज़ी एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय भाषा हे?

इस प्रश्न का उत्तर कौन दे? जब तक देश के भाग्य-विधायक यह नहीं समझ जाते कि अंग्रेज़ी की गुलामी के विष को राष्ट्र के शरीर से पूरी तरह निकाले बिना पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ संभव नहीं है, कि बना पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ के स्वस्थ, संतुलित, अनाविल दृष्टि उपलभ्य नहीं हो सकती, और बिना स्वस्थ दृष्टि पाये हम कभी अपने लक्ष्य या मार्ग को भली भाँति देख न सकेंगे-- जब तक हमारे शासक यह न समझ जाएंगे तब तक यह आशा करना व्यर्थ है कि संविधान की राजभाषा-संबंधी धारा सचमुच मान्य होगी । शायद महात्मा गांधी के मन में कहीं यह आशंका छिपी थी कि देश स्वतंत्र भी हो जाए तो भी शायद राष्ट्रीय स्वाभिमान सच्चे अर्थ में जाग्रत न हो पाए । तभी तो उन्होंने अंग्रेज़ी को हटाने के लिए निरंकुश तानाशाह की शक्ति आवश्यक समझी--अन्यथा ''यदि मैं तानाशाह होता'' की जगह कहते : ''यदि भारत स्वतंत्र हो जाता तो... '' ।   

 

 

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