भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

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होली आई - होली आई (काव्य)

Author: हर्ष कुमार

बहुत नाज़ था उसको खुद पर, नहीं आंच उसको आयेगी
नहीं जोर कुछ चला था उसका, जली होलिका होली आई

होली आई - होली आई, धूम मचाओ होली आई

नाचो-गाओ होली आई, होली आई - होली आई

कान्हा आये नाच नचैया, मची जोर से ठेलम पेल
धक्का-मुक्की ताता थैय्या, नन्द गाँव से टोली आई
घेर लिया मिल कर फिर सबने, नानी याद दिलायेंगे
लट्ठ बरसाने गोपियाँ भागीं, टोली आयी- टोली आई
घेर लिया मिल कर फिर सबने, गोपियाँ सभी भाग कर आई
लगीं लट्ठ बरसाने उन पर, मच गया शोर-होली आई- होली आई

रास महारथी कान्हा ठहरे, नहीं हाथ उनके आयेंगे
रंग जमाकर सब पर अपना, दूर निकल वो जायेंगे
दूर निकल बच कर सबसे, वो धूनी अलग जमायेंगे
राधा जी खुश होंगी कितनी, जब बंसी मधुर बजायेंगे
टोली में ग्वाले हैं कितने, भाँग घोट वो लायेंगे

रंग गिरेगा रंग जमेगा, होली आई - होली आई

झिझक छोड दो डर को जीतो, तुम भी आओ मिलकर बैठो
गुलाल धरो और रंग मलो जो जी आये उसको कर बैठो

छोटा हो लम्बा हो कितना, पतला हो मोटा हो जितना
हो पैसे वाला या सडक छाप, आज सभी है एक समान
भेद भाव कोई नहीं रहेगा, एक सभी हो जायेंगे

होली का त्योहार अनूठा, मिल कर सभी मनायेंगे
आओ हम सब मिल कर गायें होली आई - होली आई।


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