हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव

कुछ नहीं होने की पीड़ा (विविध)

Print this

Author: लतीफ़ घोंघी

कुछ नहीं हुआ। कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। नगर शांत रहा। इन सभी स्थितियों से वे दुःखी थे। उनके चेहरे पर कुछ नहीं होने की पीड़ा थी।

मुझसे मिले । बोले, "कुछ नहीं हुआ... मैं तो सोच रहा था कि कुछ न कुछ होगा... इस बन्द में एक छोटा-सा झगड़ा भी नहीं हुआ।"

इसके बाद वे उदास हो गए।

यह घटना हमारे यहाँ बन्द के दौरान की है। आह्वान था कि लोग अपने व्यवसाय बन्द रख, बन्द कराने वालों को सहयोग दें। कुछ लोगों ने मन से सहयोग दिया। कुछ लोगों ने डर के कारण सहयोग दिया। कौन लफड़े में पड़े ? दुकान बन्द ही रखो। शाम को जब रिक्शे में 'आम जनता को सूचित किया जाता है कि...' वाला एनाउन्समेन्ट हो रहा था तभी वे अपने मनसूबे बना रहे थे। अपने पड़ोसी से कहा, "घर से मत निकलना... कल दंगा जरूर होगा।"

पड़ोसी ने पूछा, "आपको कैसे मालूम हुआ?"

वह बोले, "एलाउन्समेन्ट हो रहा है सुना नहीं तुमने?"

पड़ोसी जानते थे कि वे 'एनाउन्समेन्ट' को 'एलाउन्समेन्ट' ही कहते हैं। पिछले चालीस साल से यही शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि इस शब्द को थोड़ा रफू करवा लो तो सही हो जाएगा, लेकिन वे सिंगल सोच वाले हैं। जो सोच लिया सो सोच लिया। वह कहते, "अब इस उमर में शब्दों को क्या रफू करवाएँ चलने दो !"

इस तरह के कई अंग्रेजी शब्द उनके पास थे जो रिपेरिंग के लायक हो गए थे। इसका कारण मात्र यह था कि वे शब्दों का रफ-यूज करते थे जिससे उनके उच्चारण में प्ले आ जाता था। 'स्वीट डिश' को वे 'स्वीट डिस्क' की तरह इस्तेमाल करते थे और 'टेम्परेरी' को 'टेम्परवारी' ही कहते थे। 'एपीसोड' को उन्होंने हमेशा 'ऐपिडोज़' की तरह इस्तेमाल किया और कई लोगों को डोज देते रहे।

पड़ोसी ने पूछा, "क्या कह रहे थे माइक पर एनाउन्समेंट में ?"

वह उत्साहित हो गए। बोले, "कल जरूर कुछ होगा, देखना। कहीं न कहीं कुछ न कुछ होगा। 'सच्चूसन' (सिचुएशन) ऐसी ही है। आज का अखबार कहता है कि चारों तरफ गड़बड़ है सावधान रहो ! देखना जरूर यहाँ भी गड़बड़ होगी।"

वे लगभग इस विश्वास के साथ कह रहे थे कि यदि गड़बड़ नहीं होगी तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। जहाँ भी गड़बड़ होती है वे तत्काल पहुँचते हैं। चाव से घटनाओं को देखते हैं और उसके बाद कभी उस घटना का गुणा दो से और कभी तीन से करते हुए लोगों तक इस तरह पहुँचाते हैं कि लोगों को भी लगता है कि मामला गम्भीर है।

चौक पर एक दुकानदार का झगड़ा हो गया ग्राहक से। ग्राहक उधार ले गया था और दुकानदार उससे उधार पटाने का तगादा कर रहा था। उधार लेने वाला अकड़ गया कि जब पैसे होंगे तब देंगे, और दुकानदार इस बात की जिद पर था कि पैसे उसे अभी चाहिए। कुछ गाली-गलौच भी हो गई। और ग्राहक यह धमकी देकर चला गया कि वह दुकानदार को देख लेगा ।

अब उन्होंने इस घटना को दो से गुणा किया। तुरन्त दूसरे चौराहे पर भागे। वहाँ एक आदमी को पकड़ा और बोले, "उधर गांधी चौक में स्थिति तनावपूर्ण है... कुछ भी हो सकता है... सम्भलकर रहना चाहिए आदमी को।"

गांधी चौक से वे नेहरू चौक पर आए। वहाँ उन्होंने घटना को तीन से गुणा करते हुए कहा, "माहौल बहुत सीरियसली है... पुलिस को खबर दे दी गई है... पुलिस बल आ रहा है... पता नहीं क्या हो जाएगा !"

इस तरह थोड़ी ही देर में दुकानों के शटर गिरवाने में वे सफल हो गए। फिर उन्होंने घटना को पाँच से गुणा करते हुए कहा, "छोटी-सी बात पर दंगा हो गया... देखना अब यह आग भड़केगी !"

लोगों ने एक-दूसरे को फोन पर खबरें दीं, "सावधान रहो... कुछ भी हो सकता है !"

लेकिन जब शाम तक कुछ भी नहीं हुआ तो लोगों ने उन्हें पकड़ा। जानना चाहा कि आखिर बात क्या हो गई थी ? वह बोले, "होगा क्या... कुछ नहीं हुआ था। लेकिन होने में देर क्या लगती है ? आप लोगों ने आज का अखबार पढ़ा है?"

एक आदमी बोला, "हाँ, पढ़ा है।"

वह बोले, “पढ़ा है तो समझ जाओ कि क्या हो सकता था... दंगा इसी तरह होता है। दंगा कोई एलाउन्समेंट करके नहीं आता..." मैंने आप लोगों को सावधान कर दिया तो आप ही बताइए कि मैंने क्या गुनाह कर डाला ?"

दूसरे आदमी ने कहा, "जब कुछ हुआ ही नहीं था तो आपने ऐसा क्यों कहा? मामला आपसी लेन-देन का था। यह तो रोज होता रहता है। हम तो दहशत में आ गए थे आपके कारण।"

वह बोले, "इन दिनों पूरे देश में ऐसा ही हो रहा है। आपने आज का अखबार पढ़ा या नहीं ? न पढ़ा हो तो दुबारा पढ़िए। कभी भी कुछ भी हो सकता है। छोटी बात को मामूली मत समझिए। मैंने आपको आगाह किया था।"

इसी तरह सिंगल लाइन पर उनकी सोच चल रही थी। वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि उन्होंने कोई गलती की है। तभी अचानक बन्द का आह्वान होने लगा तो वह बोले, "लो सुनो अपने कानों से... अब देखना क्या होता है !"

वे आगे बढ़ गए।

दूसरे दिन शहर बन्द रहा, लेकिन कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। घट भी कैसे सकती थी? कोई तनाव नहीं था शहर के लोगों के बीच। सभी आपसी सद्भाव से रहने वाले लोग थे। लेकिन उनकी तो आदत है कि कुछ न कुछ हो जाता तो उन्हें संतोष मिलता। मुझसे मिलने पर उन्होंने अपने इस दुःख का गुणा दो से करते हुए कहा, "कुछ भी नहीं हुआ मैं तो सोच रहा था कि..."

मैंने कहा, "अच्छा ही हुआ कि कुछ नहीं हुआ।"

मेरा उत्तर सुनकर उन्हें अच्छा नहीं लगा। वे इसी तरह के आदमी हैं। किसी का घर जल जाए तो उन्हें लोगों को बताने में स्वाद आता है। किसी की लड़की भाग जाए या किसी की बहू जल जाए तो उनके सोच की ऊर्जा कई दिनों तक बनी रहती है। वे लोगों को घूम-घूमकर बताते हैं कि कैसे क्या हुआ। जमाना खराब आ गया है। और अन्त में यह जरूर कहते हैं कि आज का अखबार पढ़ा या नहीं?

पिछले दिनों एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ लोगों ने शिकायतें की थीं। वे तत्काल सक्रिय हो गए। लोगों की बुराई का बखान करने में उन्हें बहुत आनन्द मिलता है। शिकायत बहुत ही मामूली थी, लेकिन उन्होंने इसे गुणा करते-करते इतना गम्भीर बना दिया कि ऐसा लगने लगा कि सरकार फेल हो जाएगी और व्यवस्था का ढाँचा बैठ जाएगा। वैसे भी किसी का ढाँचा बिठाने में रुचि लेना उनका चरित्र है।

वह बोले, "हमारे चरित्र में गिरावट आ गई है। कुछ तो होना ही था।"

मैंने कहा, "आपके कहने का अर्थ है कि इस बन्द में दो-चार लोगों को पार हो ही जाना था।"

वह बोले, "एक भी दुकान नहीं लुटी... कहीं कोई आगजनी नहीं हुई... आप ही बताइए कि बन्द में कहीं ऐसा हुआ है? आपने आज का अखबार पढ़ा ?"

मैंने कहा, "यह तो अच्छा संकेत है कि अपने नगर में लोग अमन-चैन पसन्द हैं... आपसी भाईचारे को समझते हैं। मैं समझता हूँ आपको प्रसन्नता ही होनी चाहिए कि अभी तक कोई अप्रिय घटना अपने यहाँ नहीं हुई।"

मैं समझ रहा था कि उन्हें मेरा ऐसा कहना अच्छा नहीं लग रहा है। वे अन्दर ही अन्दर छटपटा रहे थे। बेचैनी उनके चेहरे पर उभरने लगी थी। कुछ हो ही जाता तो उनके सोच की ऊर्जा बनी रहती, वे सक्रिय रहते। दिन-भर लोगों को बताते रहते कि वे आज का अखबार जरूर पढ़ें। उनकी सोच सिंगल लाइन पर ही चलती है, और वे इसी में प्रसन्न रहते हैं। दंगों में मरने वालों की संख्या से उनके सिंगल बदन में उत्साह की लहर दौड़ती है। लूट-पाट के समाचार से उनके बदन का रक्त संचार सही रहता है। यदि कहीं कुछ भी न हो तो शायद वे निराश होकर कुछ भी कर लेंगे। वे केवल इसीलिए अभी तक जिन्दा हैं कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी हो रही है।

नगर-बन्द को शांतिपूर्वक बनाए रखने में सहयोग देने के लिए धन्यवाद देने वाला एनाउन्समेंट करता हुआ एक रिक्शा पास से निकला। अब बेचैनी उनके अन्दर डबल हो गई थी। वे पुलिस थाने की ओर इस विश्वास के साथ बढ़ गए कि आज जो भी छोटा-मोटा अपराध हुआ होगा उसी से वे अपनी मानसिक खुराक पूरी कर लेंगे।

कुछ नहीं होने की पीड़ा अभी भी उनके चेहरे पर बनी हुई थी। और वे अंग्रेजी का कोई शब्द चबाने की भूमिका बना रहे थे।

-लतीफ़ घोंघी

Back

 
Post Comment
 
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें