समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा 'द्विज'।

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साजिदा नसरीन  (कथा-कहानी)

Author: डॉ. वंदना मुकेश

"हैलो, साजिदा..., हैलो, माफ़ कीजिएगा, आय एम साजिदाज़ टीचर...हाउ इज़ शी कीपिंग?" अगले छोर से कुछ अजीब सी फुसफुसाहट सी आई। फ़ोन पर किसी का नाम पुकारा गया, कुछ देर में फ़ोन पर किसी महिला की आवाज़ आई, "यस...,"

मैंने अपना सवाल फिर दोहरा दिया, "आय एम साजिदाज़ टीचर...हाउ इज़ शी कीपिंग?" दूसरी तरफ खामोशी...... फिर एक सिसकी।

मुझे कुछ अजीब सी बेचैनी हुई और मेरा एकदम दिल बैठ गया। सोचा, यों ही फ़ोन किया, काट दूँ... न... न... अब उचित न होगा फ़ोन काटना..

"आय एम साजिदाज़ नीज़, साजिदा... साजिदा...शी इज़ नो मोर।" उधर से आती आवाज़ उदास थी। मुझे विश्वास न हुआ कि जो मैंने सुना वह सच था।

मैं एकदम बौखलाते हुए बोली, "व्हॉट?, उधर से लगभग आवाज़ आई," यस शी इज़ नो मोर, कुड यू कॉल लेटर" उस छोर से रोने की दबी-दबी आवाज़ें कुछ तेज सी होने लगी। मैं कुछ कह-समझ पाती, इसके पहले फ़ोन धीरे से रख दिया गया था। साजिदा का चेहरा मेरी आँखों के सामने था। निर्दोष चेहरा। खूबसूरत। लजाती हँसी। मोटा काली फ्रेम का चश्मा। कानों में बड़े-बड़े झुमके सलवार कमीज़ से मैचिंग। अक्सर सिर ढँका। लाल मोटा ओवरकोट। बेडौल भारी-भरकम शरीर। लेकिन चेहरे की मासूमियत देखनेवाले को उलझा लेती थी।

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इंग्लैंड के प्रायमरी और सेकेंड्री स्कूलों में पढ़ाकर कभी भी शिक्षक होने का संतोष नहीं हुआ। मैं कॉलेज ऑफ फर्दर एज्यूकेशन में उन लोगों को अंग्रेजी भाषा सिखाने लगी जिनकी प्रथम भाषा अंग्रेज़ी नहीं थी ।मेरे विद्यार्थियों में पोलिश, लिथुएनियन, सोमाली, ईराकी, अफ़गानी बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी आदि थे। उम्र के लिहाज़ से 20 साल से लेकर 70 साल तक के विद्यार्थी थे। लेकिन मेरे लिये वे बच्चों की तरह ही थे। अंग्रेज़ी सीखने के कारण सबके जुदा थे, उनकी समझ के स्तर भिन्न थे लेकिन एक बात सबमें थी कि उनमें सीखने की जबरदस्त लगन थी। बहुत अच्छा लगता था जब कोई छात्र आकर टूटी- फूटी अंग्रेज़ी में उत्साह से यह बताता कि "टीचर आई आस्क, हाउ मच बस टिकिट? " आई फ़िल्ड द लायब्रेरी फार्म मायसेल्फ़"। जब परीक्षा पास करते तो चाक्लेट, मिठाई के अंबार लग जाते। मुझे नशा-सा हो गया था मेरे छात्रों का। कुछ इन क्लासों में अंग्रेज़ी सीखकर छोटी-मोटी नौकरी करने लगे, कुछ अपनी लगन से यूनिवर्सिटी में दाख़िल हो गये। उनके खुशी से दमकते चेहरे देखकर मेरा चेहरा भी दमकने लगता था और पढ़ाते-पढ़ाते न जाने कब, उनके छोटे-छोटे सुख दुख मेरे अपने बन जाते। उन्हें मैं निरापद लगने लगती, साल के शुरू में ही मेरा अभयदान उन्हें मेरे बहुत करीब ले आता। लेकिन हर साल नयी क्लास।

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कॉलेज ने मुझे उस साल कम्युनिटी सेंटर्ज़ में जाकर इंग्लिश पढ़ाने को कहा। जिस सेंटर पर मुझे भेजा गया वहाँ लगभग सत्तर प्रतिशत लोग नये थे। ज़्यादातर लोग पाकिस्तानी थे। परिचय खेल-खेल में किया गया। एक महिला ने मेरा ध्यान विशेष रूप से खींचा। काफ़ी मोटा-से फ़्रेम का चश्मा, छोटी, तीखी सी नाक, पतले होंठ, छोटा, गोल गोरा-सा चेहरा। सर दुपट्टे से ढंका हुआ। गले के नीचे का भाग किसी और का लगता था। क्योंकि वह बड़ा भारी और बेडौल सा था। जब वह खेल-खेल में दौड़ रही थी तो उसके हाथ-पैर शरीर, सभी अंग अलग-अलग दिशाओं में पड़ रहे थे, लेकिन उसका उत्साह ज़बरदस्त था। फिर भी जाने क्यों कुछ ऐसा था जो मैं ऩ समझ सकी। जब 'इनीशियल असेसमेंट' करने के लिये सभी लोगों को नाम लिखने का काम दिया तो उसकी लिखावट देखकर मैं दंग रह गई। फ़ाउंटेन पेन से मोती जैसे अक्षरों में उसने अपना नाम बड़ी खूबसुरती से लिखा था। मैंने कहा, साजिदा, "योर हैंडरायटिंग इज़ वेरी ब्यूटीफुल।" साजिदा किसी नई दुल्हन की तरह शरमा गई। उसके गालों पर शरम की लाली और उनमें गड्ढे। बौखलाती सी बोली, "टीचर नो वन टेल मी दिस बिफ़ोर. यू आर वेरी नाईस, टीचरआई लाईक यू " । यह साजिदा से मेरी पहली मुलाकात थी।

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मैं क्लास में अभी घुस भी नहीं पाई थी कि, अचानक कि साजिदा की आवाज़ सुनाई दी। "टीचरजी, कितनी सुंदर हैं आप! काले चश्मा और लाल टॉप में आप कितनी खूबसूरत लग रही हैं! माशाल्लाह, नज़र न लगे! सॉरी टीचरजी, यू वैरी ब्यूटीफ़ुल गागल्स एंड रेड टॉप वेयरिंग... नो एंग्री, आई स्पीकिंग इंग्लिश "
इस अकस्मात् और अप्रत्याशित विरुदावलि से मैं एकदम सकपका गई। न जाने कब और कहाँ से उसकी निगाहें मेरा पीछा करती आ रही थीं कि क्लास में घुसते ही... उसके यह कहते ही बीस से पचास की उम्र के लगभग पंद्रह जनाने-मर्दाने चेहरे मेरी ओर उठ गये।कुछ निरीक्षण-अवलोकन करते हुए, और कुछ उसकी बात पर मोहर लगाते से। मैंने भरसक सहज बनकर मुस्कराते हुए सबका अभिवादन किया और साजिदा से ही शुरुआत की।

"हैलो, हाउ आर यू", वह आँखें मिचमिचाते हुए तोते-सी बोली, "आइ एम फ़ाईन, थैंक यू। हाउ आर यू?"

फिर एक-एक कर के बाकी लोगों के इसी तरह हाल पूछा और जवाब मिलता गया । किसी का उत्साह से और किसी का अंग्रेजी ग़लत बोलने के डर से सहमा-सा। फिर, उस दिन का अंग्रेजी-पाठ पढ़ाने के लिये मैं विविध चित्र- वर्ड-कार्ड्स एवं वर्कशीट्स इत्यादि मेज पर रखने लगी। अभी रख भी नहीं पाई थी कि वह फिर आ गई, बोली, "टीचरजी, आप कभी छोड़ के तो नहीं जाओगे, मुझे बहुत डर लगता है।"

मैंने पूछा, व्हाय, व्हाट आर यू स्केयर्ड ऑफ़ ? क्यों, किससे डर लगता है?"

वह बात बदल गई। "टीचरजी, बहुत दर्द होता है" फिर उसने मेरे चेहरे के भावों के पढ़ने की कोशिश की, बोली, "अपरेशन हुआ था पेट का। मेरी..."

"ओ, आय एम रियली सॉरी एंड होप यू गैट बेटर, आय विल स्पीक टु यू आफ़्टर दि क्लास" समय भाग रहा था सो मैंने सहानुभूति जताते हुए कहा। वह एक अच्छे बच्चे की तरह जाकर अपनी जगह पर बैठ गई। पढ़ाना शुरु हुआ, फिर कैसे लगभग दो घंटे निकले, पता ही नहीं चला। लोग बाय-बाय कर जाने लगे। मैं अपना सामान उठाकर बैग में डालने लगी। मैं बोर्ड साफ़ करने उठी तो वह फिर आ गई। मेरे हाथ से बोर्ड रबर ले लिया। मैं चुपचाप अपना सामान उठाकर बैग में रखने लगी। निकलने लगी, तो वह घबराती-सी बोली,
"मुझे अकेले डर लगता है, आपको भी लगता है न? इसलिये मैं आपके लिये रुक गई थी।" फिर मेरे हाथ से मेरा बैग लगभग खींचते हुए बोली, "बैग मुझे दे दीजिये, भारी है।"

मैंने कहा, " इट्स ओके साजिदा, यू आर वैरी काइंड बट आय कैन कैरी माय बैग "

लेकिन वह अपनी अधूरी बात पूरी करना चाहती थी ,सो फिर बोली "टीचरजी, मेरा अपरेशन हुआ था, मेरी बेबी की डेथ हो गई। मैं बहुत दुखी हूँ।" उसने अचानक से अपना कुर्ता ऊपर पलट दिया, उसका गोरा थुलथुल पेट एकदम मेरी आँखों के सामने था। यह इतना अप्रत्याशित था कि मैं घबरा गई कि नई- नई नौकरी है, कहीं इंगलैंड के सेफ-गार्डिंग आदि किसी नियम के उल्लंघन में न फँस जाऊँ।

"कुर्ता नीचे करो, ओह..,!" फिर मैंने भरसक सहानुभूतिपूर्ण स्वर में पूछा, ",कब? ", कुर्ता नीचे करती हुई वह बोली "जी बीस साल हो गये..... "

"..........."???

मैं चलने लगी तो वह मेरे आगे दौड़कर दरवाज़ा खोलकर खड़ी हो गई, फिर मेरे साथ चलने की कोशिश में अपने भारी-भरकम शरीर को जैसे-तैसे संभालती तेज कदमों से चलने लगी।
मेरी कार सामने थी, सो लॉक खोलते हुए मैंने कहा, " ओह, मुझे बहुत अफ़सोस है।लेकिन अल्लाह की मर्ज़ी के आगे किसी का बस नहीं है, आप खुश रहने की कोशिश करें।"
वह फिर कुछ कहने ही वाली थी कि मैंने कहा, "साजिदा, वेन्सडे को क्लास के बाद बात होगी, मुझे दूसरी क्लास लेने जाना है और बाय-बाय, टेक केयर कह के मैं फुर्ती से गाड़ी में बैठ गई। वह प्यासी-सी, ख़ुदा हाफ़िज़ कह कर मेरी गाड़ी को ओझल होने तक देखती रही।

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एक दिन क्लास के बाहर ही दौड़ती हुई वह मुझसे आकर ज़ोर से लिपट गई। उसके गले से घों-घों कर रोने जैसी आवाज़ निकल रही थी। मैंने बहुत प्यार से उसे थपथपाते हुए पूछा, "व्हाट हैपन्ड साजिदा?" वह और ज़ोर से लिपट गई। मेरे कंधे पर भारी बैग लटका था और ऊपर से साजिदा का लगभग पूरा भार। मैं उसे तसल्ली देते हुए और सीधा करते हुए बोली, " क्या हुआ? बताओगी नहीं तो कैसे पता चलेगा?

मेरे चेहरे के एकदम नज़दीक, वह रोआँसी-सी मुँह बिसूरते हुए बोली "टीचरजी, अम्मी पाकिस्तान जा रहे हैं अपरेशन के लिये। बाजी भी जा रहे हैं साथ में। मुझे नहीं लेजा सकते, मेरी तबियत ठीक नहीं रहती ना। टीचरजी, आप मुझे बहुत प्यार करना। मुझे अम्मी के बगैर मंदा लगेगा। टीचरजी, आप का चेहरा देखने के लिये मैं जल्दी-जल्दी आ जाती हूँ। बताएँ, आप मुझे प्यार करेंगी न?" मेरा गरदन हिलाने से उसे तसल्ली न हुई। मुझे, दोनों हाथों से पकड़कर हिलाते हुए वह बोली, टीचरजी, बताएँ, आप मुझे प्यार करेंगी न?" उसके चेहरे की मासूमियत देख कर मैंने कहा, साजिदा, मैं तो आप को बहुत प्यार करती हूँ, आप न डरें, न घबराएँ। क्लास में ज़रूर आएँ। मुझसे आश्वासन पाने पर ही उसने क्लास में दाख़िल होने दिया।

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होमवर्क लेकर साजिदा सुबह-सुबह हाज़िर हो जाती, कहती, टीचरजी मैंने सबक याद कर लिया और कस के आँख मींचे कहती जाती। आई हैव ए हैडेक, माई आई हर्ट्स, माई नेक हर्ट्स.....। उसके सबक याद करने से बाकी लोगों के चेहरों पर मैं आश्चर्य, प्रशंसा, आतंक, जलन.... कई-कई भाव आते- जाते देखती। साजिदा की किताब में स्माईली फ़ेस और शाबासी में मेरा " वेल डन " बोलना उसे इतना भाता कि वह खुशी से चमकने-दमकने लगती। साजिदा का बस चलता तो वह मुझे और किसी से बात करने का मौका ही नहीं देती। लेकिन साजिदा को मैं यह बात बहुत प्यार से समझा चुकी थी कि यहाँ अंग्रेज़ी सीखने आये सभी लोगों को मेरी ज़रूरत है।

वह मेरी बात किसी समझदार बच्चे की तरह मान जाती। मैं भी कोशिश यही करती कि वह क्लास में व्यस्त रहे, चाहे अंग्रेज़ी संभाषण अभ्यास में या लिखित अभ्यास।

एक दिन बोली साजिदा, "टीचरजी आप बहुत अच्छी हैं। कितने प्यार से समझाती हैं आप। टीचरजी, वो लोग मुझे बहुत मारते थे। टीचरजी, आपके चेहरे पर अल्लाह का नूर है।" उसकी बातें मुझे असहज कर देती थी। मैं उसके कई ऐसे जुमलों के नज़रअंदाज़ कर आगे पढ़ाने लगती।

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सचाई तो यही थी कि मुझे उसकी बातें कभी बौखला देतीं, कभी सोचने पर मजबूर कर देती। मैं अक्सर उसके दुख से दुखी हो जाती। भीतर। कहीं बहुत गहरे। एक पढ़ी-लिखी ज़हीन लड़की पति के अत्याचारों से इस हद तक प्रताड़ित की जा सकती है कि वह अपनी सहजता, अपना होश खो बैठे। फिर भी मेरा सहज रहकर उसे उम्मीद देना, उसकी अच्छाइयों की चर्चा करने के कारण उसे क्लास आना अच्छा लगने लगा। वह बड़े अदब से पेश आती और कहती, "अम्मी कहती हैं उस्ताद का ओहदा ऊँचा होता है। आप मेरे उस्ताद हो, कितने प्यारे हो आप मेरी बाजीजी हो" बाजी के साथ एक और जी मेरे प्रति उसके सम्मान का ही सूचक था। उसकी अम्मी अस्सी साल की थीं और अपनी इस बदनसीब बेटी की देखभाल कर रहीं थीं। बहन और उसका परिवार यहीं था। भान्जियाँ उसे नज़रअंदाज कर देती थीं यह बात उसे बिल्कुल पसंद न थी। किंतु वह अपनी कमी भी समझती थी। यह सब बातें मुझे वही बताती थी। क्लास खत्म होने पर जब मैं अपने कागज़ बैग में रखती तब वह नियम से बोर्ड साफ़ करती और फिर मेरी प्रतीक्षा करती रहती कि कब मेरा काम खत्म हो और कब वह मुझे अपनी बातें सुनाएँ। मेरे मना करने पर भी वह रोज़ मुझे कार तक छोड़ती। नज़रों से ओझल होने तक देखती। यों तो मैं कई क्लासों को पढ़ाती थी रोज़ कई लोगों से मुलाकात होती थी लेकिन उसके और मेरे बीच में, मेरे न चाहने के बावज़ूद, एक अनकहा रिश्ता बनता जा रहा था।

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हाज़िरी लेते-लेते साजिदा के नाम पर निगाह अटक गई। पाँच छुट्टियाँ लगातार... साजिदा क्यों नहीं आ रही?... अचनाक मैं एक अजीब किस्म की बेचैनी से भर गई। मैंने महसूस किया कि इन पाँचों क्लासों मैंने उसकी कमी महसूस की है। पहली बार तो शायद उतना ध्यान नहीं दिया, बल्कि यह लगा कि आज उसकी तक़लीफ़ों का चिठ्ठा फिर से नहीं सुनना पड़ेगा। दूसरी बार अन्य लोगों से पूछा तो सभी के चेहरे जानकारी न होने से सपाट नज़र आए, सोचा, सामवार को तो आ ही जायेगी। फिर सोमवार को भी साजिदा नहीं आई तो मुझे चिंता सी होने लगी क्योंकि अक्सर वह कॉलेज में फोन पर न आने की सूचना दे देती थी। जब बुधवार को भी नहीं आई तो मैंने फिर पूछा कि किसी को मालूम है कि साजिदा क्यो नहीं आ रही?
मेरी बेचैनी बढ़ गई, इसका सबब तो मैं नहीं समझ सकी। कोई उसके आस-पास रहता है क्या? कोई जवाब नहीं।

कॉलेज पँहुचने पर क्लर्क ने बताया, "मिसेज़ शर्मा, यू हैड ए कॉल फ़्रॉम योर लर्नर, शी इज़ रियली वैरी पुअरली... आय कुडन्ट कैच हर नेम एंड नंबर बिकॉज़ शी वॉज़ कॉफ़िग।" मेरी आँखों में चमक आते-आते बुझ गई। मैंने उदास स्वर में कहा, " ओ लिन, शी मस्ट बी साजिदा, कुड यू फाइंड हर रिकॉर्डज़ फ़ार मी प्लीज़. आय रियली नीड टु कॉल हर।" लिन "व्हाय नॉट डार्लिंग" कह कर उठने ही वाली थी कि एक फोन आ गया और वह आँखों के इशारे से बोली कि थोड़ी देर में देती हूँ। मैं बेचैन सी आय. टीय रूम में अगली क्लास के रिसोर्सेज़ इकठ्ठा करने लगी। लेकिन लिन की व्यस्तता बढ़ती ही गई। अब अगली क्लास सोमवार को थी। मैं परेशान सी चली आई।

सोमवार को भी साजिदा की कोई ख़बर न थी। लिन मेरे साथ ही घुसी और बोली, " शीज़ रियली पुअरली, शी साउंडेड हॉरिबली इल, हर मदर सैड शी वॉज़ हास्पिटलाईज़्ड। रिसेप्शन डेस्क पर आते ही फ़ोन की घंटी बजी। मैं पल भर को ठिठक गई, मुझे लगा, शायद साजिदा का फ़ोन हो,। मैं क्लास की ओर जाने लगी लेकिन कान फ़ोन की घंटी पर ही थे। लिन का "हैलो, हाउ कैन आई हैल्प......."और साजिदा का नाम सुनते ही मैं उल्टे कदम मुड़ी। लिन के पुकारने के पहले मैंने फ़ोन ले लिया। दूसरी ओर साजिदा ही थी। उसके मुँह से बमुश्किल "टीईईईचर जीईई की आवाज़ निकली। उसकी आवाज़ सुनकर मेरी रूह काँप गई। वह रोती जा रही थी, आवाज़ गले में अटकी थी और घोंघों, घुर्र-घुर्र के बीच दबी-दबी सी आवाज़ में बोल रही थी, "टीचर जी, अम्मी मुझे आने नहीं देती। मेरी तबियत बहुत ख़राब है। मेरा नाम मत काटना। उससे बिलकुल भी बोला नहीं जा रहा था। मैंने उसे सिर्फ इतना कहा, "साजिदा, आपकी तबियत बिल्कुल ठीक नहीं हैं,आप आराम करें और अम्मी की बात मानें। मैं आपका नाम नहीं काटूँगी।" वह फफक-फफक कर रो रही थी। मैंने कहा, साजिदा, अब एक लफ्ज़ भी नहीं, फोन अम्मी को दें। उधर अम्मी ने फ़ोन लिया और सबसे पहले ढेर सारी दुआएँ दे डाली। "बेटी, अल्लाह आपके सलामत रखें, साजिदा हर पल आपका ज़िक्र करती है। इस समय मेरी बच्ची की तबियत बेहद ख़राब है बेटी, अल्लाह ताला से दुआ करें कि मेरी साजिदा को अच्छी सेहत बख्शे। बेटी, ये बुढ़िया आपका शुक्रिया अदा करना चाहती है। मेरी बच्ची आपकी नेकदिली और मोहब्बत की कायल है।" पीछे साजिदा के खाँसने की आवाज़ लगातार आ रही थी। "बेटी, मेरी साजिदा के साथ मैं भी आपकी शफ़क़त के लिये शुक्रगुज़ार हूँ,बेटी आपकी नज़रे इनायत बनी रहे........मैंने इतना ही कहा कि आप मुझे शर्मिंदा न करें, मेरा फर्ज़ है यह तो। आप अपना, और साजिदा का ख्याल रखें, ख़ुदा-हाफ़िज़। फ़ोन रख दिया । मैं दिल के किसी कोने में साजिदा की अम्मी के विषय में सोचने लगी... कितनी मोहब्बत भरी, लेकिन थकी हुई आवाज़ थी, यह थकन आजकल की नहीं, बरसों-बरसों की थी। ....बात-चीत के तरीके से लगा कि किसी बहुत अच्छे खानदान से है। कुछ बात थी उनकी आवाज़ में...
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दो हफ्ते और गुज़र गये । साजिदा नहीं आयी। मैं फिर बेचैन होने लगी। क्लास में अक्सर उसका ख्याल आ जाता। बोर्ड साफ़ करते में अक्सर मुझे लगता कि वह आकर ज़बरदस्ती मेरे हाथ से बोर्ड रबर लेकर कहेगी, "टीचरजी आई क्लीन बोर्ड"। "टीचरजी आई वेट फ़ार यू, आप अकेले डर जायेंगी।अम्मी भी मेरे लिये रुकती हैं, मैं डर जाती हूँ न इसलिये" क्लास में अकेले रह जाने पर उसके जुमले मुझे सहज याद आ जाते। ...
एक दिन मेरे एकदम नज़दीक आई और बोली, "मैं सुंदर नहीं हूँ न टीचरजी। मैंने कहा," ऐसा आपसे किसने कहा? " मेरे शौहर ने .... तभी तो वह मुझे मारता था ...., मेरी सब भाँजिया भी कहती हैं मेरे सामने नहीं, लेकिन मुझे मालूम है। बाजी डाँट देती है उनको ", उसकी आवाज़ एकदम डूब गई थी। मैं तड़प गई उसके लिये। इंसान की बेबसी उसे कितना कमज़ोर बना देती है। मैंने बहुत गहरे स्वर में कहा, "साजिदा, लोग जलते हैं आप इतनी प्यारी हैं कि जो ऐसा कहता है वह आपको कमज़ोर बनाना चाहता है। आपको कमज़ोर नहीं बनना है। आप न सिर्फ़ खूबसूरत हैं बल्कि आप की हैंडरायटिंग भी इतनी खूबसूरत है। आप अपना सबक याद करती हैं...आप भी कितनी अच्छी हैं....... " उसने खुशी के मारे एकदम से मेरा हाथ चूम लिया। आप भी कितनी अच्छी हैं, अम्मी भी यही कहती हैं। अपने अस्तित्व की स्वीकृति मात्र से वह पुलकित हो गई। खुशी से उसके गाल सुर्ख हो गये। उसने लजाते हुए सिर ढँक लिया। उसकी मासूम खुशी मुझे भीतर गहरे कहीं छू गई।

9

कॉलेज में उस दिन फिर मेरे लिये मैसेज था लिन की टेबल पर -'साजिदाज़ मदर कॉल्ड। साजिदा स्टिल पुअरली, कॉल ऑन 342853' मेरी दोनों क्लासेज़ खत्म हो गई थीं। मैंने सोचा, चलो फ़ोन कर लूँ। साजिदा 'अटेंशन सीकिंग' थी और मेरी प्रिय भी। पहले भी कई बार फोन पर बातचीत की थी। फोन साजिदा ने ही उठाया, बीमार थी लेकिन पुलक कर बोली, मेरे टीईईचरईजी आ.आप कितनेएए अच्छे हो, प्लीज़ मेरा नाम..खुल्ल,खुल्ल,खुल्लखुल्ल मत खुल्ल,खुल्लखुल्ल काटना खुल्लखुल्ल। उसके लिये बोलना मुश्किल था। "ओह, साजिदा फोन अम्मी को दें।" अम्मी से बात हुई। उन्होंने बताया कि तबियत बहुत ज़्यादा खराब है साजिदा की लेकिन वह कॉलेज आने की ज़िद करती है। रोती है। दो दिन हास्पिटल में थी। फिर वे बोलीं, "बेटी, अल्लाह से मेरी बच्ची के लिये दुआ करो। फिर वे दबी-सी आवाज़ में बोलीं, "बेटी, मैं जानती हूँ कि आप काफ़ी मसरूफ़ रहती होंगी, लेकिन खुदा के लिये कभी आप घड़ी-दो-घड़ी के लिये मेरे घर आ सकें तो आप की बहुत मेहरबानी होगी, मेरी बच्ची ठीक हो जाए...शायद...। मैंने कहा, न, न, ऐसी कोई बात नहीं, आप पता बताए। फिर उसी दबी ज़बान से उन्होंने अपना पता लिखवाया। मैं सोच रही थी, क्यों जबरदस्ती गुड़ की डली बनती हूँ। लेकिन इस ख्याल को ज़्यादा हवा न देते हुए मैंने सीधे बैग हाथ में लिया और गाड़ी में बैठ गई। नैविगेशन सिस्टम नदारद। झुँझुलाते हुए फिर निकली। कॉलेज जाकर इंटरनेट से स्ट्रीट मैप प्रिंट किया और फिर वापस पार्किंग की ओर। बैठने पर विचार आया कि मैं मरीज़ को देखने जा रही हूँ कुछ फल ले चलूँ। फिर सोचा कि क्या जरूरी है ले जाना, जा रही हूँ यही क्या कम नहीं? फिर लगा, मैं क्यों इस तरह की घटिया बातें सोच रही हूँ। सुपरमार्केट में गाड़ी रोकी। फिर दो-तीन तरह के फल खरीदे। फिर उसकी खाँसी का दौरा याद आ गया तो एक हरबल चाय पत्ती का पैकेट खरीदा। फिर कुछ बिस्किट भी ले लिये और जल्दी से जल्दी पँहुचने के लिये निकल पड़ी। उसके घर पँहुचने में भी दस मिनिट लगेंगे, फिर दस मिनिट बैठना भी पड़ेगा। फिर घर पँहुचने में भी पैंतालीस मिनिट लगने थे। साढ़े चार बज चुका था। दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। उसकी गली में मुड़ते ही वह दिमाग में यह ख्याल आया कि न जाने कैसा घर होगा? वह किस हाल में होगी? फिर कोसा, स्वयं को। गाड़ी सड़क पर ही पार्क करनी पड़ी। सामान लेकर दरवाज़े की घंटी बजाने की सोच ही रही थी कि दरवाज़ा खुला और साजिदा आकर गले से लिपट गयी।"मेरे बाजीजी आ गये, मेरे टीचरजी, मैं जानती थी आप ज़रूर आय़ेंगे। उसकी साँस तेज-तेज चल रही थी। उसकी आवाज़ दो धातुओं के घिसे जाने पर आनेवाली किरकिराहट से भरी थी। बड़े संभालकर काबू कर के वह इतना ही बोल पाई। मैं अंदर गई। वहाँ एक बड़ा सा टी.वी.चल रहा था।साजिदा की अम्मी बैठी थीं। रंग गोरा,मध्यम काठी की, मोटी न थीं, अपने समय में खूबसूरत रही होंगी, हल्के रंग का सलवार-कमीज़ पहने थी । मैंने उन्हें झुककर सलाम किया। उन्होंने मेरा माथा चूमा। साजिदा के घर आने के पहले मन में जितनी शंकाएं थीं वे सब जाने कहाँ खो गई थीं, सब कुछ सहज ही हो रहा था। मुझे लगा, अच्छा किया मैंने साजिदा के घर आकर।उसकी अम्मी ने अपनी मोहब्बत के खज़ाने में से मुझे जी भरकर दुआएँ दी और मैंने उन दुआओं की पाकीज़गी महसूस की। मैं मालामाल हो गई थी। सोफ़े के पास एक डिब्बा पड़ा था, मेरी नज़र पड़ते ही साजिदा उसे छुपाने के लिये झुकी कि उसे खाँसी का दौरा पड़ गया। उस डिब्बे में थूकते-थूकते वह बेदम हो गई। अम्मी उठना चाह रही थीं लेकिन मेरे उठकर साजिदा की पीठ सहलाने से उनके चेहरे पर तसल्ली के भाव उभर आये। मैं साजिदा को देर तक सहलाती रही। जब खाँसी रुकी तो उसने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया। मैं भी उसका हाथ सहलाती रही। उसकी अम्मी बहुत धीरे-धीरे कह रही थीं कि "मेरी बच्ची की तकलीफ़ देखी नहीं जाती। ताजिंदगी अल्लाहताला ने इसके बड़े इम्तिहान लिये हैं। अब मेरी इन बूढ़ी हड्डियों में ज़ोर तो नहीं हैं लेकिन मेरी बच्ची के लिये मैं जीना चाहती हूँ। मेरे लिये तंदुरुस्ती की दुआ करना बेटी, कि मैं अपनी बच्ची का ख्याल रख सकूँ। वे बोलते हुए लगातार अपनी आँखे पोँछती जा रही थीं। बेटी मैं आपकी कुछ खिदमत नहीं कर सकी, आप कितना कुछ ले आई हैं मैं कैसे आपका शुक्रिया अदा करूँ" उनके बड़प्पन के आगे मैं खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगी। मैंने कहा, आप मुझे शरमिंदा न करें, बच्चों का शुक्रिया अदा नहीं करते आंटी, आप तो बस दुआएँ दें।
साजिदा ने तब तक सारे पैकेट खोल दिये थे। वह अंगूर निकालकर तन्मयता से खाते हुए कह रही थी, "बाजीजी, मेरे प्यारे टीचरजी, कितने स्वीट ग्रेप्स लाये हैं आप। प्यारे टीचरजी, मैं ठीक हो जाऊँगी न। टीचरजी, नाराज़ तो नहीं होंगे मैंने होमवर्क नहीं किया है... मुझे फ़ेल मत करना... मुझे आपसे ही पढ़ना है। "
मैंने कहा, "साजिदा, आप प्रॉमिस करें कि आप होमवर्क की फ़िक्र न करें। जब अच्छा महसूस हो तब कर लें होमवर्क। अम्मी को परेशान न करें। जब बिल्कुल ठीक हो तब आएँ। " वह किसी समझदार और अच्छे बच्चे की तरह गरदन हिला रही थी। मैं खड़ी हो गई थी। मैं साजिदा की अम्मी को खुदा हाफ़िज़ कहकर निकल पड़ी। मैं नहीं जानती थी, साजिदा से वह मेरी आख़िरी मुलाक़ात थी।

--डॉ. वंदना मुकेश, यू. के
ईमेल : vandanamsharma@hotmail.co.uk

 

 

 

 

 

 

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