हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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दिल (कथा-कहानी)

Author: सुनील कुमार शर्मा

सागर में काफ़ी दूर जाने के बाद, मगर अपनी पीठ पर बैठे बन्दर से बोला, "मुझे क्षमा करना मित्र! मैंने तुमसे झूठ बोला था। असल मे मेरी मगरी ने तेरे दिल का भक्षण करना है; इसलिए मैं तुझे अपने घर ले जा रहा हूँ।"

यह सुनकर बन्दर ने उसे समझाया, "ओ मूर्खप्राणी मगर! आज के जमाने मे अपने पास दिल रखता ही कौन है? हर किसी ने, किसी ना किसी को अपना दिल दे रखा है। यकीन ना हो तो मेरी छाती चीरकर देख लो, मैंने तो अपना दिल अपनी बंदरिया को दे रखा है। तू इतना बेवकूफ है कि तुझे पता ही नहीं कि तूने अपना दिल अपनी मगरी को दे रखा है।"

बन्दर को वापिस छोड़कर, मगर बड़ी तेजी से तैरते हुए मगरी के पास पंहुचा और बड़ा उत्तेजित होकर उससे बोला, "बन्दर ने तो अपना दिल अपनी बंदरिया को दे रखा है और मैंने अपना दिल तुझे दे रखा है। अब तू बता तूने अपना दिल किसे दे रखा है?"

यह सुनकर, घबराई हुई मगरी अपनी छाती टटोलने लगी कि दिल किधर गया; पर घबराहट मे उसे तेजी से धड़कता हुआ अपना दिल भी नहीं मिल रहा था।

-सुनील कुमार शर्मा

संपर्क: सुनील कुमार शर्मा
गाँव: नौगावां
उप-तहसील:शहज़ादपुर
जिला:अंबाला, हरियाणा
ई-मेल: sharmasunilkumar727@gmail.com
दूरभाष: 9813929916

 

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