हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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गधे से सीख  (कथा-कहानी)

Author: लोक साहित्य

एक शाम की बात है। मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर की छत पर चढ़े और चारों ओर का नज़ारा देखा। उनको लगा कि इतनी ख़ूबसूरत शाम है, तो क्यों न अपने गधे को भी छत पर ले आया जाए। इन नज़ारों का लुत्फ़ बेचारा गधा भी ले ले।

मुल्ला ने गधे को सीढ़ी पर चढाने की कोशिश की और बड़ी मुश्किल से वे उसे चढ़ा पाए। जब गधा ऊपर पहुंचा तो मुल्ला ने देखा कि वो तो अपनी जगह पर अड़ा है। शाम की ख़ूबसूरती से बेनियाज़ खड़ा है। मुल्ला को ये देखकर मायूसी हुई। अब वो गधे को नीचे ले जाने के लिए ज़ोर लगाने लगे। गधा नीचे नहीं उतरा तो मुल्ला खुद नीचे आ गए। थोड़ी देर बाद मुल्ला ने छत से अजीबो ग़रीब आवाज़ें सुनीं। ऊपर गए तो देखा कि गधा अपनी दुलत्तियों से कच्ची छत को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। मुल्ला ने फिर उसे नीचे उतारने की कोशिश की मगर गधे ने दुलत्ती मार कर मुल्ला को ही छत से नीचे गिरा दिया और थोड़ी देर बाद गधा टूटी हुई छत से खुद भी नीचे आ गिरा।

मुल्ला ने कहा कि आज इस वाकए से मैने तीन सबक सीखे। पहला, गधे को कभी ऊंची जगह नहीं ले जाना चाहिए वरना गधा उस ऊंचे मुकाम को बरबाद कर देता है। दूसरे, जो इंसान उसे ऊपर ले जाता है उसे भी नुकसान पहुंचाता है और तीसरा कि अंत में गधा ख़ुद भी नीचे आ गिरता है। बहुत देर ऊपर नहीं टिक पाता।

[ भारत-दर्शन संकलन]

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