हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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फीजी (काव्य)

Author: राजकुमार अवस्थी

प्रकृति-सुंदरी का अंत:पुर
फीजी नंदन-वन लगता है।

सागर की उत्ताल तरंगें
याद दिलाती हर-हर गंगे
देख देख साँवरी घटाएँ
हर मौसम सावन लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥१॥

पुष्पित औ' पल्लवित लताएँ
झूम झूमकर नाचें, गाएँ
घाटी के आँचल में फैला
उपवन वृन्दावन लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥२॥

रेवा - बा की जल धाराएँ
गंगा-जमुना सी लहराएँ
तन-मन की यह प्यास बुझाएँ
इनका तट पावन लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥३॥

फीजी के प्रसन्न नर नारी
बुला मुस्कुराहट है प्यारी
इनकी ख़ुशी की खुशबू से यह
सुरभित चंदनवन लगता है।
फीजी नंदन-वन लगता है ॥४॥

चलती-फिरती दीप-शिखाएँ
फीजी की सुन्दर बालाएँ
इनके पद-संचालन से ही
सूवा-पार्क मधुवन लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥५॥
स्वस्थ, गठीले तरुण सजीले
खिले पुष्प से पीले-नीले
भागें, दौड़ें रग्बी खेलें
यौवन का मेला लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥६॥

मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे
गूंज रहे सबके जयकारे
होली, ईद, दिवाली, क्रिसमस
हर दिन यहाँ पर्व लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥७॥

नगर रम्य नांदी, लौटोका
लंबासा माथे का टीका
सूवा शहर अपने वैभव में
हीरक कंठहार लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥८॥

शिव शम्भू कैलाश विराजे
नागराज धरती पर साजे
अतल कुंड भूखंड तैरता
यह रमणीक द्वीप लगता है
फीजी नंदन-वन लगता है ॥९॥

-राजकुमार अवस्थी

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