कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

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बदलकर आंसुओं की धार | गीत (काव्य)

Author: तुलसी

बदलकर आंसुओं की धार को मैं मुस्कुराती हूँ।
जगाती ओज की धारा बहुत सुख-चैन पाती हूँ॥
ना मेरे शब्द है उनके लिए जो देशद्रोही हैं।
वतन से प्यार है जिनको उन्हें कविता सुनाती हूँ॥
बदलकर आंसुओं की-------

अगर माटी के पुतले देह में ईमान जिंदा है।
तभी इस देश की समृद्धि का अरमान जिंदा है ॥
न भाषण से हैं उम्मीदें, न वादों पर भरोसा है।
शहीदों की बदौलत मेरा हिंदुस्तान जिंदा है॥
बदलकर आंसुओं की-------

लोकहित में उठी वाणी सदा अपनाई जाएगी।
मनुष्यता ही है मजहब बात यह समझाई जाएगी॥
समय की रेत पर की खींची रेखाएँ मिट भले ही जाएं।
पर हर एक युग में सिर्फ कविता गाई जाएगी॥
बदलकर आंसुओं की-------

काया में देशभक्ति का प्रवाह बढ़ेगा।
साहस से साजिशों का हर एक दुर्ग रहेगा॥
जब तक है सरहदों पर खड़ा एक भी जवान।
ऐ हिंद, तू आजाद है आजाद रहेगा॥
बदलकर आंसुओं की-------

-तुलसी
 ईमेल : shallydxt@gmail.com

 

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