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बुद्धिमान वन हंस (बाल-साहित्य )

Author: राजकुमारी श्रीवास्तव

एक वन में एक बहुत बड़ा सघन वृक्ष था। वृक्ष में बड़ी-बड़ी डालियां और शाखाएं थी। पत्ते भी लंबे-लंबे और हरे-हरे थे। छाया बड़ी घनी होती थी। कभी भी धूप नहीं आती थी।

वृक्ष के ऊपर कई हंसों ने अपने घोंसले बना रखे थे। हंस घोसलों में सुख से जीवन व्यतीत करते थे। यूं तो सभी हंस साधारण थे, पर उनमें एक बड़ा बुद्धिमान और अनुभवी था। वह जो भी बात कहता था, सोच समझकर कहता था। उसकी कही हुई बात सच निकलती थी।

एक दिन बुद्धिमान हंस ने वृक्ष की जड़ में से एक लता निकलती हुई देखी। उसने अन्य हंसों को भी वह लता दिखायी। दूसरे हंसों ने लता को देख कर कहा, "तो क्या हुआ? वृक्ष की जड़ से लता निकल रही है, तो निकलने दो। हमें उस लता से क्या लेना-देना है?" 

बुद्धिमान हंस बोला, "ऐसी बात नहीं है। हमारा इस लता से बहुत गहरा संबंध है, क्योंकि यह लता उसी वृक्ष की जड़ से निकल रही है, जिस पर हम सब रहते हैं।

वन-हंसों ने कहा, "तुम्हारी बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। साफ-साफ कहो, क्या कहना चाहते हो?" 

बुद्धिमान हंस बोला, "आज यह लता बहुत छोटी-सी है, धीरे-धीरे यह बढ़कर बड़ी हो जाएगी। एक दिन आएगा जब यह वृक्ष से लिपट जाएगी और मोटी हो जाएगी। जब यह मोटी हो जाएगी तो कोई भी शत्रु इसके सहारे नीचे से चढ़ सकता है और ऊपर पहुंचकर हम सबको हानि पहुंचा सकता है।

बुद्धिमान हंस की बात सुनकर सभी वन-हंस हँस पड़े और बोले, "तुम तो शेखचिल्ली की-सी बात कर रहे हो। अरे, यह लता अभी छोटी सी है। किसे पता है, बढ़ेगी भी या नहीं?" 

बुद्धिमान हंस बोला, "हां, अभी छोटी सी तो है, पर जिस चीज से हानि होने की संभावना हो, उसे पहले ही नष्ट कर देना चाहिए। इसलिए इस लता को अभी बढ़ने नहीं देना चाहिए। इसे नष्ट करना चाहिए। यह बढ़ेगी तो हम सबके दुख का कारण बनेगी। बुद्धिमान हंस ने दूसरे हंसों को बहुत समझाया पर उन्होंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा, "लता जब बढ़ेगी तो देखा जाएगा। अभी कुछ करने की क्या आवश्यकता है?" बुद्धिमान हंस मौन रह गया। 

लता धीरे-धीरे बढ़ने लगी। वह वृक्ष से लिपट गई। धीरे-धीरे मोटी भी हो गई। इतनी मोटी कि कोई भी आदमी नीचे से उसके सहारे ऊपर चढ़ सकता था। एक दिन सवेरा होने पर सभी हंस भोजन की तलाश में उड़ कर चले गए। घोसले खाली हो गए। हंसों के चले जाने पर वृक्ष के नीचे एक शिकारी पहुंचा। उसने वृक्ष पर हंसो के घोंसलों को देखकर सोचा, "इन हंसों को सरलता से जाल में फसाया जा सकता है। कल सवेरे जाल लेकर आऊंगा, वृक्ष पर चढ़कर जाल फैला दूंगा। हंस अपने आप ही जाल में फंस जाएंगे। 

दूसरे दिन शिकारी जाल लेकर आ पहुंचा। हंस भोजन की तलाश में जा चुके थे। शिकारी ने मोटी लता के सहारे ऊपर चढ़कर घोसलों के ऊपर जाल बिछा दिया। वह जाल बिछाकर अपने घर चला गया। शाम को जब हंस लौटे तो सभी अपने घोसलों में जाने के लिए आतुर हो रहे थे, पर जब घोसलों में जाने लगे तो बेचारे जाल में फंसकर फड़फड़ाने लगे।

जाल में फंसे हुए हंस रोकर कहने लगे, "हाय-हाय, अब क्या करें? जाल से निकले तो किस तरह? शिकारी आएगा और हम सब को जाल में ले जाएगा। हम सब मारे जाएंगे। हंसों का रोना सुनकर बुद्धिमान हंस उनके पास गया। बोला, "अगर तुम लोगों ने मेरी बात मान कर लता को नष्ट कर दिया होता, तो आज तुम सब इस जाल में ना फंसते। शिकारी ने मोटी लता के सहारे ही वृक्ष के ऊपर चढ़कर घोसलों पर जाल बिछाया था।" 

हँस आंसू बहाते हुए बोले, "भाई, जो हो गया, वह हो गया। अब तो कोई ऐसा उपाय करो, जिससे हम सब मरने से बच जाएं। बुद्धिमान हंस सोच कर बोला, "एक उपाय से तुम सब बच सकते हो। जब शिकारी आए तो तुम सब मुर्दे के समान पड़ जाओ। शिकारी तुम्हें मरा हुआ समझकर जाल से बाहर निकालकर फेंक देगा। जब तक वह आखिरी हंस को भी जाल से बाहर निकालकर फेंक ना दे, तुम सब को धरती पर मुर्दे की तरह पढ़ा रहना है।" 

दूसरे हंसों को बुद्धिमान हंस की बात पसंद आई। उन्होंने कहा, "ठीक है, शिकारी के आने पर हम ऐसा ही करेंगे। दूसरे दिन जब शिकारी आया तो हंसों ने उसे देखते ही मुर्दे की तरह व्यवहार किया। शिकारी ने पेड़ पर चढ़कर जाल के पास जाकर देखा, तो सभी हंस मुर्दे की तरह पड़े हुए थे। शिकारी हंसों को मरा हुआ देखकर बड़ा दुखी हुआ। वह जाल से एक-एक हंस को निकाल कर जमीन पर फेंकने लगा। जब तक उसने आखरी हंस को जाल से निकाल कर जमीन पर नहीं फेंक दिया तब तक सभी हंस मुर्दे की तरह जमीन पर पड़े रहे। 

आखिरी हंस के जमीन पर फेंक दिए जाने के तुरंत बाद ही वे सब के सब पंख फड़फड़ाते हुए आकाश में उड़ान भर गए। शिकारी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह आँखें फाड़े आकाश में उड़ते हुए हंसों की ओर देखने लगा। इस तरह बुद्धिमान और अनुभवी हंस की बात मानने से सभी हंसों की जान बच गई। 

कहानी से शिक्षा : 
 
- अनुभवी आदमी की बात ना मानने से कष्ट उठाना पड़ता है। 
- अनुभवी आदमी की सलाह का सदा आदर करना चाहिए।
- - शत्रु को पनपने नहीं देना चाहिए। पनपने से पहले ही उसे नष्ट कर देना चाहिए।

- राजकुमारी श्रीवास्तव, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली
[पंचतंत्र की श्रेष्ठ कहानियाँ]

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