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इश्तिहार (कथा-कहानी)

Author: शैलजा कौशल

तलवे से अलग हुआ फटा जूता पहने, पैर घिसता, गले में अपने चाचा की पुरानी टाई लटकाए, घिसी पुरानी कमीज - पैंट पहने आलोक पिछले तीन दिन से एक से दूसरे मार्केटिंग दफ्तरों में चक्कर लगा रहा है। उसे अफसरी तो नहीं करनी है पर वह अपनी बहन सुमति और अपने लिए दवा और खाना जुटाने निकला है। जब से उसे ह्यूमन होर्डिंग यानी इंसानी इश्तिहार के काम के बारे में पता चला है, वह पूरे मन से इस काम की तलाश करने में जुटा है। मालूम चला है कि मेन रोड पर ह्यूमन होर्डिंग बनकर डटे रहने के कुछ सौ रुपए मिलते हैं। पेट भरने के सवाल ने पिछले एक महीने से उसके रातों की नींद उडा ली है। सुमति घर पर पडी बुखार से तप रही है, इसी घबराहट में आलोक की कमीज पसीने से तर हो रही है। कडी गर्मी में वह सुबह से शाम तक कहीं किसी काम की तलाश में एक से दूसरी जगह चक्कर काट रहा है। माता पिता के देहांत के बाद आलोक और उसकी बहन चाचा केदारनाथ के घर पर दिल्ली में ही रहते रहे लेकिन अब उनका काम मंदा चल रहा था। बडे परिवार के बोझ के चलते उन्होंने आलोक और सुमति को अपने घर से अलग कर दिया है जिससे सुमति की जिम्मेदारी और अपना खुद का जीवन आलोक के कंधों पर आ गया है। बडी मुश्किल से लाजपत नगर में एक रैनबसेरे में भाई बहन को पनाह मिली है। पढाई बीच ही में छूट गई। अगर यह दिन न आते तो दोनों अगले साल कॉलेज में दाखिला लेते। आलोक अब तक हमेशा फस्र्ट डिवीयन में पास होता रहा है। अब पढाई छूट जाने का गम उसे अलग निगल रहा है। हर नौजवान की तरह उसने भी अपने भावी जीवन को लेकर सपने देखे थे। उसे चाहत थी कि वह एमबीए में एडमीश्न ले और एक मल्टीनेशनल कंपनी के मार्केटिंग विभाग में बडी पोस्ट पर काम करे और इस तरह वह एक दिन कंपनी की सबसे उंची पोस्ट तक पहुंच जाए। तब वह अपनी बहन सुमति की शादी एक अच्छे परिवार में कर पाएगा। खूब पैसा और नाम कमाएगा। लेकिन पढाई छूट जाने के बाद से उसके सभी इच्छाएं और सपने धुंधला गए थे। आलोक बेहद निराश था। समय तो बस अब रोटी की तलाश का था। अब तो पेट भरने के लिए जो काम मिलेगा वह करना पडेगा।

दिल्ली जैसे शहर में काम काज की वैसे ही बडी मार है। किसी को किसी दूसरे की खबर लेने का वक्त नहीं। ऐसे में एक किराए के रैनबसरे में रहते समय रजत नाम के एक लडके ने आलोक को पैसे कमाने के तरीके बताए हैं। उसी से सीख लेकर आलोक काम ढूंढने निकला है। आलोक को ह्यूमन होर्डिंग के काम के बारे में पता चला है। यह एक तरह से इश्तिहार बनने का काम है। उसे अपने उपर इश्तिहार लेकर सडक पर खडे रहना है। बदले में कुछ पैसे रोज के रोज हाथ आते रहेंगें। ‘मेरे और तुम जैसे ही नहीं पढे लिखे लडके भी यह काम कर रहे हैं।‘ रजत ने उससे कहा था। गरीबी में पैसे की आस भी बहुत बडी बात हो जाती है। और फिर आलोक के सामने तो जीने के लिए कमाने का सवाल था। कुछ घंटों इश्तिहार बनकर खडे रहने के रुपए मिलेंगे। एक मार्केटिंग कंपनी 'डिजीटल कलर' के बारे में उसे पता चला है।

‘जी सर, आप जैसे ही कहेंगे और जहां कहेंगें मैं आ जाउंगा। जगह चाहे जो भी हो साब। पूरा दिन डटकर काम करुंगा।‘ आलोक की जरुरत और काम करने की इच्छा को देखकर आखिरकार ‘डिजीटल कलर‘ मार्केटिंग कंपनी में उसे दिहाडी पर ह्यूमन होर्डिंग यानी इश्तिहार बनने का काम मिल गया। फर्म मैनेजर हेमंत मल्होत्रा ने काम देने से पहले ही बात ‘क्लीयर‘ कर दी। ‘देखो आलोक, काम हम दे रहे हैं। यह एक हफ्ते की डील है। तुम्हें इश्तिहार के तौर पर ‘शाईन‘ साबुन ब्रांड का स्टिकर पीठ पर लगाकर मेन बाजार में खडे रहना है। मेन रोड के किनारे तुम्हें सुबह से शाम तक रहना है। उसके बाद शिफ्ट बदलेगी और तुम्हारी जगह नया लडका आएगा। खाना पीना सब काम के बाद। नो ब्रेक। इसके लिए तुम्हें दो सौ रुपए एक दिन के दिए मिलेंगें।‘ हेमंत जब उसे काम समझा रहा था तो आलोक बडी हसरत भरी निगाहों से कभी उसके लैपटॉप को तो कभी चमचमाते कमरे को देख रहा था। बत्तियों से रोशन यह आॅफिस कितना बडा है। उस आॅफिस से बाहर आते समय आलोक की नजरें एक एक कुर्सी को निहार रही थीं। उसे भी इन्हीं में से एक सीट पर बैठना था। वह शायद अपनी सीट खोज रहा था लेकिन मन में भय था कि कहीं इश्तिहार बनने का यह काम हाथ से न निकल जाए। इसलिए वह नजरें चुराकर वहां चल पडा। कहीं किसी को भनक लग गई उसके ख्यालों के बारे में तो दो लात मारकर बाहर निकाल देंगें।

सारा दिन कमीज पर स्टिकर चिपकाकर कडी धूप में खडे रहना एक मुश्किल काम था। उस पर जून महीने की धूप, पर दो सौ रुपए की बात सुनकर आलोक को कुछ बेहतर लग रहा था। हां करने के अलावा और कोई आॅप्शन नहीं था। पैसे हाथ में आने से पहले ही ख्यालों में दिखने लगे थे और उसे अब कमाई की आस हो रही थी। चार पैसे हाथ आएंगें तो पेट को रोटी नसीब होगी।
रात में आलोक सो नहीं पा रहा था। उसके दिमाग में मार्केटिंग कंपनी के अफसर हेमंत का कमरे के ख्याल घूम रहे थे। किस्मत साथ देती, माता पिता जिंदा रहते और पढाई चलती रहती तो एक दिन वह अपनी एमबीए कम्पलीट करके जरुर ऐसी कंपनी में हेमंत जैसी कुर्सी तक पहुंच जाता। लैपटॉप, कांच का टेबल, लैदर की कुर्सी, चमचमाता कमरा, बाहर बैठा स्टाफ और हर समय ड्यूटी देने वाला पिउन। लेकिन अब भी क्या बिगडा है। इश्तिहार बनकर वह सडकों पर काम करेगा और पैसा कमाएगा। फिर कमाई होने लगेगी और एक दिन उसके पास एडमिशन के लिए पैसे इकठ्ठा हो जाएंगें। फिर वह पढाई के साथ साथ काम करेगा और ढेर सारे रुपए कमा लेगा जिससे जीवन बेहतर हो जाएगा और इसी तरह वह दिन भी दूर नहीं रह जाएगा जब उसे अफसरी करने को मिलेगी।

अगले दिन सोमवार था और इश्तिहार के तौर पर मेन बाजार में डटने का पहला दिन। आॅफिस से सुंदर नाम का पिउन उसे बाजार तक छोडने अपना मोटरसाइकिल लेकर तैयार था। वह साथ में वह कार्ड बोर्ड का इश्तिहार भी लाया था जिसे आलोक को अपने पीछे बांधना है। सुंदर बातचीत करने का बहुत शौकीन था। रास्ते भर उसने आलोक को बातचीत में लगाए रखा।

‘आलोक भाई इधर उधर हिलना मत ताकि लोग तुम्हारी पीठ देख पांए। मकसद तो लोगों को तुम्हारे पीठ पर बंधे बोर्ड को दिखाना है न। अरे इस शहर में टाइम ही किसके पास है जो अखबार में इश्तिहार पढे, टीवी का चैनल भी इश्तिहार के आते ही बदल देते हैं। तो ऐसे में इस ट्रैफिक लाइट पर जब लोग रुकते हैं तो उनकी नजर इधर उधर जाती है और तुम्हारी पीठ पर पडेगी तो हो गया न 'शाईन' साबुन का इश्तिहार और फिर अब तो इंसानी इश्तिहार का ही तो जमाना है।' सुंदर की बातें सुनकर आलोक मन ही मन सोचने लगा कि एक दिन उसके पास भी आॅफिस स्टाफ होगा और वह भी लोगों से ऐसे ही काम लेगा। तब वह इस तरह पिउन के पीछे बाइक पर थोडे बैठेगा। उसके पास कम से कम दो कार होंगी। और साथ एक ड्राइवर भी होगा उसे यहां से वहां ले जाने के लिए। तब उसके पास इश्तिहार की नौकरी ढूंढने जब लडकें आया करेंगें तो वह उनके साथ वह बडे अदब से बात करेगा। क्योंकि वह जानता है कि यह काम करने वाले बडी मजबूरी और हालात के मारे होते हैं।

अब क्योंकि वह कंपनी का मालिक होगा, ऐसे में उसके आगे पीछे नौकरी ढूंढने वाले लडकों की कतारें लगी रहेंगी। कितने लोग होंगे जो उसकी कंपनी में नौकरी करना चाहेंगें। उसके लैपटॉप पर ई मेल्स पर सीवी आते रहेंगें और वह छांटकर अपने स्टाफ को आगे का काम समझा देगा। वैसे भी जब स्टाफ हो तब काम बंट जाता है और कंपनी का सिस्टम ठीक ठाक चलता रहता है। और फिर वह तो मैनेज करेगा। हार्ड बोर्ड का इश्तिहार उठाए सुंदर की मोटरसाइकिल के पीछे बैठे बैठे और इन्हीं ख्यालों में डूबा आलोक कब ट्रैफिक लाइट्स तक पहुंच गया उसे आभास भी न हुआ। कितने सुहाने होते हैं सपने भी, वक्त का भी अहसास नहीं होने देते। सुंदर ने सडक किनारे मोटरसाइकिल रोकी और हार्ड बोर्ड का स्टीकर आलोक की पीठ पर सेट किया। हार्ड बोर्ड का यह इश्तिहार थोडा भारी भी था। आलोक की पीठ और टांगे एकदम सध गई और उसे हिलने डुलने में तकलीफ भी हुई।

‘बस, अब डट जाओ दोस्त। शाम को रुपए मिलेंगें तो मन खिल जाएगा तुम्हारा।‘

दसवीं की पढाई छोडकर आया आलोक दिनभर इस तरह भूखा प्यासा धूप में खडे रहने का ख्याल से डर रहा था। सुंदर ने यह भांप लिया ‘घर में सब्जी तरकारी आएगी, खाना आएगा।‘ सुंदर ने जाने से पहले आलोक को कमाई की आस बंधाईं।

अब आलोक की परीक्षा शुरु हो गई थी। और आलोक ने हर परीक्षा फस्र्ट क्लास में पास की है। बडी ही दृढता से उसने अपने काम की शुरुआत की। बिना हिले डुले सावधान की मुद्रा में पीठ के पीछे ‘शाईन‘ साबुन का हार्ड बोर्ड स्टिकर लगाए डटा हुआ था। उसने ध्यान दिया कि आने जाने वाले लोग उसकी तरफ देख रहे थे। कुछ लोग तो रुककर भी उसकी पीठ के पीछे लगा हार्ड बोर्ड पढ रहे थे। उसने भांप लिया था कि अब वह एक इश्तिहार है। शाईन साबुन का इश्तिहार। दो घंटे से ज्यादा का समय बीत गया था। आलोक का गला पानी के लिए सूख रहा था। धूप में खडे रहने के कारण सुबह का खाया ब्रेड का एक पीस भी कब का पेट में खो गया था। भूख जोरों से लगी थी। पसीने की धार उसके सिर से बहकर पीठ के नीचे तक जा रही थी। जैसे ही आलोक का मन छुटने लगता वह शाम को मिलने वाले दो सौ रुपयों को याद करके फिर से डट जाता।

कुछ ही समय बीता था कि एक कडक आवाज ने उसे चैंका दिया, ‘अबे ओ शाईन जरा हट पीछे। कहीं भी आकर खडे हो जाते हैं।‘ आलोक बडी मुश्किल से पीछे मुडा तो देखा तो एक टैªफिक पुलिस का जवान उसकी ओर देखकर सीटी बजा रहा था। ‘जी, मैं ह्यूमन इश्तिहार हूं। हमारे मैनेजर के पास परमीशन है।‘

‘अरे पता है रे। तू पीछे हट यहां से नेता जी की गाडी निकलनी है। हट पीछे।‘ ट्रैफिक पुलिस के जवान ने जबान जरा कसकर कहा तो आलोक कांप गया। ‘जी मुझे यहीं खडे रहना है।‘ ‘अरे, यहीं खडे रहना है का क्या मतलब है। हमने कहा न पीछे हट।‘ आलोक को डांट खाकर पीछे हटना पडा। अपनी जगह से हिल जाने पर वह घबरा गया। हेमंत मल्होत्रा अगर आ धमका तो क्या होगा। यह ख्याल और दो सौ रुपए हाथ से निकल जाने का भय उसे घेर रहा था। आलोक बार बार अपनी पहले वाली जगह पर जाकर डटने की कोशिश कर रहा था लेकिन पुलिस वाला उसे डंडा दिखाकर फिर से पीछे करता रहा। हेमंत के कहे शब्द आलोक के कानों में गूंज रहे थे। 'डटकर खडे रहना, एक जगह खडे रहने के ही तुम्हें पैसे मिलेंगें।'

'अरे, तू फिर यहां आकर डट गया। अबे ओ शाइन मंत्री जी की गाडी निकलनी है यहां से। तू समझता क्या है खुद को। ये ले, एक पडेगी तो होश ठिकाने आ जाएगी।' कहते हुए पुलिस वाले ने एक डंडा आलोक की टांग पर जड दिया। टांग पर डंडा लगने से आलोक की पिंजनियां और नसें कांप गई और करारा झटका मिलने से वह जमीन पर जा गिर पडा। उसके इस तरह गिरने से उसकी पीठ पर चिपका होर्डिंग उसके उपर पलट गया। अब न तो उससे उठते बनता, न हिलते। उस पर लकडी का होर्डिंग उसकी पीठ छील गया, डंडे के दर्द से टांग सुन्न हो रही थी। 'चल अब उठ, यहीं पडा रहेगा क्या। उठकर चलता बन यहां से।' पुलिस वाले ने अपने जूते से आलोक की पीठ को हिलाया।

'साब, मैं सच कह रहा हूं। मुझे यहां खडे रहने के लिए मैनेजर ने कहा है। मैं शाइन साबुन का इश्तिहार कर रहा हूं। शाम को मुझे कुछ पैसे मिलेंगे जिनसे मैं अपना और अपनी बहन का पेट भर सकुंगा। साब, अगर वे लोग देखने आ गए और मैं यहां न हुआ तो वे मुझे मेरा मेहनताना न देंगे। साब, हाथ जोडता हूं प्लीज मुझे यहां न हिलाईए।' आलोक ने जमीन से उठने की पुरजोर कोशिश की पर टांग की चोट और होर्डिंग के भार तले दबे होने के कारण वह उठ न सका।

उसका सिर जोर जोर से चक्कर खा रहा था। फडफडाते होंठ एक घूंट पानी के लिए तरस गए थे। 'अबे ओ पागल, तूझे समझ में नहीं आता मैं क्या कह रहा हूं। तू यहां अपना साबुन लेकर खडा रहेगा क्या। दिमाग घूम गया है क्या तेरा। चल अपने मैनेजर को जाकर बोल तूझे हटा दिया पुलिस ने वहां से। आज यह इश्तिहार नहीं लग सकता यहां। जा, पागल कहीं का।' पुलिस वाले ने जोर से झिडका तो आलोक ने पूरा दम लगाकर उठने की कोशिश की और किसी तरह संभला। इतना कहका पुलिस वाला दूसरी ओर चल दिया। उसके जाते ही आलोक धीरे धीरे सरकता हुआ अपनी जगह पर आ खडा हुआ। उसकी हालात बहुत खराब हो रही थी लेकिन हेमंत मल्होत्रा के डर से और अपने काम को ठीक ढंग से करने के लिए आलोक ने जी जान एक करने की सोच रखी थी। टांग के दर्द से कराहाते हुए उसने अपने आपको सीधे रखने की पुरजोर कोशिश जारी रखी। पीठ पर टंगा होर्डिंग उसकी कंधों को काटने लगा था। सूरज की प्रचंड धूप में उसके कपडे पसीने से तर हो चुके थे। कंधे के पीछे शायद चोट से थोडा खून भी बह रहा था। शाम को एक बूंद पानी की होंठों से लगेगी इस आस में उसने अपना पूरा ध्यान शाइन साबुन के इश्तिहार में लगा दिया था। अभी उसे संभले पांच मिनट ही हुए थे कि उसने देखा वही पुलिस वाला फिर से डंडा लिए उसकी ओर बढ रहा है। उसे देखने से आलोक की आंखों में चमक सी पडी और सब धुंधला सा पड गया। तभी एक जोरदार डंडा आलोक की दूसरी टांग पर पडा और वह वही गिर गया। 'तू ऐसे नहीं मानेगा। ये ले एक और खा।' कहते हुए उसने दोंनों टांगों पर डंडे जड दिए। 'अब उठकर दिखा। पडा रह यहीं पर। कम से कम यहां खडा तो नहीं दिखाई देगा तू। पागल।'

अब तक आलोक लगभग होश खो चुका था। वह पीठ के बल गिरा था और कार्ड बोर्ड का होर्डिंग उसके कंधे काट चुका था। लगता था जैसे डंडे के वार से टांगे टूट गई हैं। बडी जोर की मारा था उस पुलिस वाले ने। पसीने से भीगे कपडों में आलोक अपनी सुध खो रहा था लेकिन तभी सुंदर की कही बात उसे याद आई कि तुम्हारी पीठ पर लगा होर्डिंग हर हाल में आते जाते लोगों को दिखाई देते रहना चाहिए। आलोक को बार बार ख्याल आ रहा था कि हेमंत उसे दो सौ रुपए दे रहा हैं और वह रात को बहन सुमति के साथ बैठकर सब्जी रोटी खा रहा है। इस ख्याल से आलोक को कुछ सुध आई और उसने पूरी कोशिश की ताकि वह होर्डिंग को अपने उपर की ओर ले आए और खुद पेट के बल नीचे की तरफ लेट जाए। इससे कम से कम होर्डिंग तो दिखता रहेगा। आखिर उसने शाम तक होर्डिंग को इस सडक पर लेकर खडे रहने का वादा किया था। इसके लिए उसे रुपए भी मिलने हैं। कडे डंडों की वजह से और कटे कंधों के दर्द से उसे पलटने में बहुत दर्द हो रहा था। आखिरकार उसने पूरा दम लगाया और पेट के बल पलटकर शाइन साबुन के होर्डिंग को उपर ले आया। बस इतना करते ही आलोक मुंह के बल बेसुध हो गया।

मंत्री जी की कार का काफिला उस सडक से गुजर गया। शाम होने को थी। म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की एक गाडी सडक पर दुकानदारों के एन्क्रोचमेंट को हटाती हुई आगे बढ रही थी। तभी एक अफसर की नजर जमीन पर पडे शाइन साबुन के ह्यूमन होर्डिंग पर पडी। 'अरे भई, यह क्या है। यह तो कोई व्यक्ति गिरा पडा है। तो यह ह्यूमन होर्डिंग है। लगता है गर्मी से बेहोश हो गया है।' कहकर उस अफसर ने आलोक को हिलाने की कोशिश की।

अरे भई अजीत सुनो।' अफसर ने अपने स्टाफ के एक व्यक्ति को पास बुलाया।

'अब इसका क्या करना है। ये यूं जमीन पर पडा है। है तो होर्डिंग ही न। और यह बाजार भी नहीं है। तो यह एन्क्रोचमेंट का ही मामला बनता है न।' उसने पूछा। 'जी साहब, बिलकुल एन्क्रोचमेंट है। ट्रैफिक लाइट्स पर इश्तिहार है। परमीशन होगी तो अपने आप छुडवा ले जाएंगें। फिलहाल तो डालिए गाडी में।' स्टाफ ने अपने अफसर को जवाब दिया।

'कल सुबह इस साबुन की कंपनी को बुलावा भेजते हैं। अरे सुनो, इस 'होर्डिंग' को उठाकर गाडी में लोड करो। यह एन्क्रोचमेंट का मामला है ......' ढलते सूरज में म्यूनिसीपल कॉरपोरेशन की वह गाडी बेसुध पडे आलोक और उसकी पीठ पर बंधे हार्ड बोर्ड को बाकि सामान के साथ लादकर ले जा रही थी।

- शैलजा कौशल
मकान नंबर: 288, इंडियन एक्सप्रैस सोसायटी, सेक्टर 48 ए, चंडीगढ, भारत
पिन कोड 160047
मोबाइल नंबर - +91 8146282288
ई मेल- writetoshailja@gmail.com

 

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