क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।

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राजभाषा हिंदी  (विविध)

Author: डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

हर साल हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है। स्वतंत्रता- प्राप्ति के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया था कि खड़ी बोली हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा सन् 1953 से संपूर्ण देश में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका अनुपालन आज तक बराबर होता आ रहा है।

विगत साठ-सत्तर वर्षों से हम यह दिवस बड़े उत्साह और उमंग से मनाते आ रहे हैं। समय आ गया है अब हम इस बात पर विचार करें कि इन सत्तर वर्षों के दौरान हिंदी ने अपने स्वरूप और आधार को कितना समृद्ध किया है? अगर नहीं किया है तो उसके क्या कारण हैं?

भाषण देने, बाज़ार से सौदा-सुलफ खरीदने या फिर फिल्म/सीरियल देखने के लिए हिंदी ठीक है, मगर कौन नहीं जानता कि वैश्वीकरण के इस दौर में अच्छी नौकरियों के लिए या फिर उच्च अध्ययन के लिए अब भी अंग्रेजी का दबदबा बना हुआ है। इस दबदबे से कैसे मुक्त हुआ जाए? निकट भविष्य में आयोजित होने वाले हिंदी-आयोजनों के दौरान इस पर भावुक हुए बिन वस्तुपरक तरीके से विचार-मंथन होना चाहिए। निजी क्षेत्र के संस्थानों अथवा प्रतिष्ठानों में हिंदी की स्थिति शोचनीय बनी हुई है और मात्र कमाने के लिए इस भाषा का वहां पर ‘दोहन' किया जा रहा है।  इस प्रश्न का उत्तर भी हमें निष्पक्ष होकर तलाशना होगा।

यों देखा जाए तो हिंदी-प्रेम का मतलब हिंदी विद्वानों,लेखकों,कवियों आदि की जमात तैयार करना कदापि नहीं है। हिंदी-प्रेम का मतलब है हिंदी के माध्यम से रोज़गार के अच्छे अवसर तलाशना, उसे उच्च-अध्ययन ख़ास तौर पर विज्ञान और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के लिए एक कारगर माध्यम बनाना और उसे देश की अस्मिता व प्रतिष्ठा का सूचक बनाना। कितने दुःख की बात है कि हिंदी दिवस तो पसरते जाते हैं, मगर खुद हिंदी सिकुड़ती जा रही है। कहने को तो आज इस देश में हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है किन्तु स्थिति भिन्न है। चाहे विश्विद्यालयों या लोकसेवा आयोगों के प्रश्न-पत्र हों, या फिर सरकारी चिट्ठी-पत्री, मोटे तौर पर राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी ही है। रैपिड इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के सर्वव्यापी विज्ञापन और कुकरमुत्ते की तरह उगते इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का डंका बजाते दीख रहे हैं। जहां-जहां अभिलाषा या जरूरत है, वहां-वहां अंग्रेजी है।

दरअसल, इन पैंसठ-सत्तर सालों में सत्ता का व्याकरण हिंदी में नहीं अंग्रेजी में रचा जाता रहा है। सता के केंद्र में बैठे लोग औपचरिकतावश हिंदी का समर्थन करते रहे,अन्यथा भीतर से मन उनका अंग्रेजी की ओर ही झुका हुआ था। हिंदी की ओर होता तो शायद आज हिंदी को लेकर परिदृश्य ही दूसरा होता। जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि हिन्दी प्रचार-प्रसार या उसे अखिल भारतीय स्वरूप देने का मतलब हिन्दी के विद्वानों, लेखकों, कवियों या अध्यापकों की जमात तैयार करना नहीं है। जो हिन्दी से सीधे-सीधे आजीविका या अन्य तरीकों से जुडे हुए हैं, वे तो हिन्दी के अनुयायी हैं ही। यह उनका धर्म है, उनका नैतिक कर्तव्य है कि वे हिन्दी का पक्ष लें। मैं बात कर रहा हूं, ऐसे हिन्दी वातावरण को तैयार करने की जिसमें भारत देश के किसी भी भाषा-क्षेत्र का किसान, मजदूर, रेल में सफर करने वाला हर यात्री, अलग अलग काम-धन्धों से जुडा आम-जन हिन्दी समझे और बोलने का प्रयास करे। टूटी-फूटी हिन्दी ही बोले, मगर बोले तो सही।

हिंदी प्रचार-प्रसार सम्बन्धी कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुझे सम्मिलित होने का सुअवसर मिला है। इन संगोष्ठयों में अक्सर यह सवाल अहिन्दी-भाषी हिंदी विद्वान करते हैं कि हम तो हिंदी सीखते हैं या फिर हमें हिंदी सीखने की सलाह दी जाती है, मगर आप लोग यानी हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग हमारे दक्षिण भारत की एक भी भाषा सीखने के लिए तैयार नहीं हैं। यह रटा-रटाया जुमला मैं कई बार सुन चुका हूँ। आखिर एक सेमिनार में मैंने कह ही दिया कि दक्षिण की कौनसी भाषा आप लोग हम को सीखने के लिए कह रहे हैं? तमिल/मलयालम/कन्नड़/या तेलुगु? और फिर उससे होगा क्या? आपके अहम् की संतुष्टि? पंजाबी-भाषी डोगरी सीखे तो बात समझ में आती है। राजस्थानी-भाषी गुजराती सीख ले तो ठीक है। इन प्रदेशों की भौगोलिक सीमाएं आपस में मिलती हैं, अतः व्यापार या परस्पर व्यवहार आदि के स्तर पर इससे भाषा सीखने वालों को लाभ ही होगा। अब आप कश्मीरी-भाषी से कहें कि वह तमिल या उडिया सीख ले या फिर पंजाबी-भाषी से कहें कि वह बँगला या असमिया सीख ले (क्योंकि इस से भावात्मक एकता बढेगी) तो आप ही बताएं यह बेहूदा तर्क नहीं है तो क्या है? इस तर्क से अच्छा तर्क यह है कि अलग-अलग भाषाएँ सीखने के बजाय सभी लोग हिंदी सीख लें ताकि सभी एक दूसरे से सीधे-सीधे जुड़ जाएँ। वह भी इसलिए क्योंकि हिंदी देश की अधिकाँश जनता समझती-बोलती है।

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

पूर्व सदस्य,हिंदी सलाहकार समिति,विधि एवं न्याय मंत्रालय,भारत सरकार।
पूर्व अध्येता,भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,राष्ट्रपति निवास,शिमला तथा पूर्व वरिष्ठ अध्येता (हिंदी) संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार।

ई-मेल: skraina123@gmail.com,

 

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