हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।

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होली आई रे (विविध)

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Author: डॉ मनिन्दर भाटिया

"होली के दिन दिल खिल जाते है
रंगों में रंग मिल जाते है
गिले-शिकवे भूल के दोस्तों
दुश्मन भी गले मिल जाते है।"

शोले पिक्चर का यह गीत वास्तव में इस बात को चरितार्थ करता है कि होली के दिन लोग अपने गिले-शिकवे भूल कर एक दूसरे के रंग में रंग जाते है। होली भारतीय त्योहारों में आनंदोल्लास का त्यौहार है। नाचने-गाने, हँसी मजाक, मौज मस्ती करने व भेदभाव जैसे विचारों को निकाल फैंकने का अवसर है। संस्कारों की जननी भारतीय भूमि को देव भूमि कहा गया है। जहां सदियों से देवत्व अच्छाई को स्थापित करने के लिए प्रत्येक बुराई और दुःख को सुख में बदलने के लिए हिन्दू धर्म में प्रयास किये जाते रहे है। इन प्रयासों में जब कभी भी उन्होंने सफलता प्राप्त की तो उसे एक उत्सव या त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा। 

होली का त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली से सम्बन्धित कई दंत कथाए प्रचलित है। होली की पूर्व संध्या को होली जलाई जाती है। इससे सम्बन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार कहा जाता है कि प्रह्लाद के पिता राजा हिरण्य कश्यप स्वयं को भगवान मानते थे व विष्णु के परम विरोधी थे परंतु प्रह्लाद विष्णु के उपासक थे। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु की पूजा करने से रोका जब वह नही माने तो उन्होंने उसे मारने के अनेकों प्रयास किये लेकिन सभी प्रयास असफल सिद्ध हुए। अपने प्रयासों में असफल होने के बाद उन्होंने अपनी बहन होलिका से सहायता मांगी।  होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई।  होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था इसलिए होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गई परन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई। इस प्रकार यह कथा इस बात की तरफ संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की विजय अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते है और अगले दिन सब लोग एक दूसरे पर गुलाल और कई प्रकार के रंग डालते है। यह त्यौहार रंगों का त्यौहार है। इस दिन प्रातः काल उठकर लोग रंगों को लेकर अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, सगे सम्बन्धियों के घर जाते है और जमकर होली खेलते है। ब्रज की होली पूरे भारत में लोकप्रिय है। ब्रज के लोग राधा के गांव जाकर होली खेलते है। मन्दिर कृष्ण भक्तों से भरे रहते है। 

होली का त्यौहार मनाने का एक और वैज्ञानिक कारण भी है हालाँकि यह होलिका दहन की परम्परा से जुड़ा है। शरद् ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन का यह काल पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरियां की वृद्धि कर देता है  लेकिन जब होलिका जलाई जाती है तो उससे क़रीब 145 डिग्री फारेनेहाइट तक तापमान बढ़ता है। परम्परा के अनुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते है तो होलिका से निकलता ताप शरीर और आस-पास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है और इस प्रकार यह शरीर और पर्यावरण को स्वस्थ रखता है। दक्षिण भारत में जिस प्रकार होली मनाई जाती है उससे यह अच्छे स्वास्थ्यलाभ को प्रोत्साहित करती है। होलिका दहन के बाद इस क्षेत्र में लोग होलिका की बुझी आग की राख को माथे पर विभूति के तौर पर लगाते है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए वे चंदन और हरी कोपलों और आम के वृक्ष के बोर को मिलाकर उसका सेवन करते है।

कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि रंगों में खेलने से स्वास्थ्य इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि रंग हमारे शरीर तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कई ढंगों से प्रभाव डालते है। पश्चिमी फीजिशियन और डाक्टरों का मानना है कि एक स्वस्थ शरीर के लिए रंगों का महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे शरीर में किसी रंग विशेष की कमी कई बीमारियों को जन्म देती है  जिसका उपचार केवल उस रंग विशेष की आपूर्ति करके ही किया जा सकता है परन्तु आजकल होली के त्यौहार को दूषित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। लोग आजकल अच्छे रंगों का उपयोग ना करके रासायनिक लेपों व कृत्रिम प्रसाधनों का प्रयोग कर रहे है। नशे व हुल्लड़बाजी करके इस त्यौहार की गरिमा को कम करने का प्रयत्न कर रहे है। इस रंगों के त्यौहार को मंगलमय रूप में ही मनाया जाना चाहिए।

डॉ मनिन्दर भाटिया
1953-ए, गली न. 4-बी,
जुझार सिंह एवन्यू
अजनाला रोड
अमृतसर।
मोबाइल न. 9814755367


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