मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।

Find Us On:

English Hindi
Loading

राजेश ’ललित’ की दो क्षणिकाएँ  (काव्य)

Author: राजेश ’ललित’

ख़्वाब

थे हमारे भी !
कुछ ख़्वाब,
पर नींद नहीं आई;
पलकों से बाहर ही
रहे ख़्वाब !
मचलते हुए
जाना है हमको भी
पलकों के पीछे।

-राजेश 'ललित'
ई-मेल: fearlessr56@gmail.com

 

#

आज नहीं

जाना था हमको भी
उसी महफ़िल में--
तन्हा थे जो आये भी;
नहीं गये फिर हम भी:
तन्हाईयों की भीड़ में,
कि खो न जाएँ कहीं,
सोचा, आज नहीं फिर कभी।

--राजेश 'ललित'
 ई-मेल: fearlessr56@gmail.com

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.