जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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लेकर रेखा से कुछ बिन्दु | गीत  (काव्य)

Author: विजय रंजन

लेकर रेखा से कुछ बिन्दु, आओ रेखा नई बनाएँ।।
चलो कि वक्र-वक्र रेखा को, हम सब सीधी राह दिखाएँ ।।

तिर्यक तिर्यक से सम्बन्ध !
जीवन निरालम्ब अनुबन्ध !
विह्वल विकल से स्वप्न सँजोए,
श्रांति - परिधि परिबन्ध !!
चलो तलाशें सत् शिव-त्रिज्या, सुन्दर सा परिपथ अपनाएँ ।।

दीर्घवृत्तीय आस - विलास !
हर पल बहुकोणिक संत्रास !
काश ! कि हम छोटे कर पाते -
अपनी अभिलाषा के व्यास !!
चलो नियामक नए बना कर, हम नूतन निमेय सजाएँ ।।

दृष्टि की जीवा : महदाकाश !
केन्द्र बने प्रज्ञा - विश्वास !
काश ! लक्ष्य आधार बन सके,
चेतन-वृत्त का चरम विकास !!
काश ! कि हम सब चतुर्भुजी, वैश्वानर बन कर दिखलाएँ !!

चलो कि वक्र-वक्र रेखा को, हम सब सीधी राह दिखाएँ ।।
लेकर रेखा से कुछ बिन्दु, आओ रेखा नई बनाएँ।।

- विजय रंजन
  सम्पादक अवध-अर्चना
  4/14/41 ए महताब बाग, अवधपुरी कालोनी-फेज-2
  फैजाबाद-224001 (उ॰ प्र॰) भारत
  दूरभाष : 09415055433
  ई-मेल ranjanvijay82@gmail.com

 

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