जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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दो बाल कविताएं  (बाल-साहित्य )

Author: डॉ वंदना शर्मा

चाँद

मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर-टुकुर तकता है
मुँह से तो कुछ न बोले
पर मन ही मन ये हँसता है
चैन से मुझको सोने नहीं देता
खुद सारी रात चलता है
मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर टुकुर तकता है

इसको भी चपत लगाओ
खूब ज़ोर से डांट लगाओ
मुझको नींद आती है
फिर ये सारी रात जगता है
मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर टुकुर तकता है

ये नहीं स्थिर मन का
कभी घटता, कभी बढ़ता है
कभी आकाश में छुप जाता है
मुँह से तो कुछ न बोले
पर मन ही मन ये हँसता है
मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर टुकुर तकता है

- डॉ वंदना शर्मा 

 

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छुक छुक चलती ट्रेन

धुआं उडाती चलती ट्रेन
तुम भी चढ़े, हम भी चढ़े
दोनों मिलें दोस्त बने
बातें बढ़ी, यारी बढ़ी
छुक-छुक आगे बढ़ी ट्रेन

ये हवा बहे साथ-साथ
रस्ते चलते हैं साथ-साथ
हम चलेंगे साथ-साथ
चलती है साथ-साथ ये ट्रेन
छुक छुक चलती ट्रेन


- डॉ वंदना शर्मा
ई-मेल: vandna.reporter@gmail.com

 

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