हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। - शारदाचरण मित्र।

Find Us On:

English Hindi
Loading

जीत तुम्हारी (काव्य)

Author: विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक'

तुम हो अपने शत्रु किन्तु मैं मीत तुम्हारी
तुम जीवन को हार किन्तु मैं जीत तुम्हारी

प्रबल झकोरों में झंझा के बह जाते हो
मन के तूफानों में नहीं ठहर पाते हो
गहन विचार सिन्धु में डूबे उतराते हो
भाव शिखर पर चढ़ते पर उलटे आते हो

विफल रुदन के बीच बनी मैं गीत तुम्हारी
तुम जीवन की हार किन्तु मैं जीत तुम्हारी

माया की मोहिनी फंसाती तुम फंस जाते
तृष्णा हँसती कहां हरिण से तुम हँस पाते ?
गहन पंक में मद के तुम गहरे धंस जाते
ममता बंधन कसते, नहीं तनिक खस पाते

भाती है अनरीति तुम्हें, मैं रीत तुम्हारी
तुम हो अपने शत्रु किन्तु मैं मीत तुम्हारी

भरता है अविवेक कुलांचे रीते मन में
ईष्र्या दहक रही है, आग लगे ज्यों वन में
ठोकर खाते पा जाते धोखा क्षण-क्षण में
जग में सार न रस दिखता तुमको जीवन में

शंकित तुम हो, मैं हूं किन्तु प्रतीत तुम्हारी
तुम जीवन की हार किन्तु मैं जीत तुम्हारी

-विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक'
[धर्मयुग, फरवरी, 1951]

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश