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कुम्भ की पौराणिक कथाएं (कथा-कहानी)

Author: भारत-दर्शन संकलन

कुम्भ भारतीय संस्कृति का महापर्व कहा गया है। इस पर्व पर स्नान, दान, ज्ञान मंथन के साथ-साथ अमृत प्राप्ति की बात भी कही जाती है।

कुम्भ की कथाओं के अनुसार देवता और दैत्यों में बारह दिनों तक जो संघर्ष चला था, उस दौरान अमृत कुम्भ से अमृत की जो बूंदें छलकी थीं और जिन स्थानों पर गिरी थीं, वहीं वहीं पर कुंभ मेला लगता है। क्योंकि देवों के इन बारह दिनों को बारह मानवीय वर्षों के बराबर माना गया है, इसलिए कुम्भ पर्व का आयोजन बारह वर्षों पर होता है। जिस दिन अमृत कुम्भ गिरने वाली राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग हो उस समय पृथ्वी पर कुंभ होता है। तात्पर्य यह है कि राशि विशेष में सूर्य और चंद्रमा के स्थित होने पर उक्त चारों स्थानों पर शुभ प्रभाव के रूप में अमृत वर्षा होती है और यही वर्षा श्रद्धालुओं के लिए पुण्यदायी मानी गयी है। इस प्रकार से वृष के गुरू में प्रयागराज, कुम्भ के गुरू में हरिद्वार, तुला के गुरू में उज्जैन और कर्क के गुरू में नासिक का कुम्भ होता है। सूर्य की स्थिति के अनुसार कुंभ पर्व की तिथियां निश्चित होती हैं। मकर के सूर्य में प्रयागराज, मेष के सूर्य में हरिद्वार, तुला के सूर्य में उज्जैन और कर्क के सूर्य में नासिक का कुम्भ पर्व पड़ता है।

कुम्भ का बौद्धिक, पौराणिक, ज्योतिषीय के साथ-साथ वैज्ञानिक आधार भी है। वेद भारतीय संस्कृति के आदि ग्रंथ हैं। कुम्भ का वर्णन वेदों में भी मिलता है। इस समय कुम्भ एक वैश्विक संस्कृति के महापर्व का रूप धारण करता जा रहा है। कुम्भ के दौरान विश्व भर से लोग आते हैं और हमारी संस्कृति में रचने-बसने का प्रयास करते हैं, इसलिए कुम्भ का महत्व और बढ़ जाता है। कुम्भ प्रत्येक 12 वर्ष पर आता है। प्रत्येक 12 वर्ष पर आने वाले कुम्भ पर्व को अब शासकीय स्तर पर महाकुंभ और इसके बीच 6 वर्ष पर आने वाले पर्व को कुम्भ की संज्ञा दी गई है।

पुराणों में कुम्भ की अनेक कथाएं मिलती हैं। तीन कथाएं उल्लेखनीय हैं। 

[ भारत-दर्शन संकलन ]

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