जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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मैं तुम्हारी बांसुरी में.... (काव्य)

Author: नर्मदा प्रसाद खरे

मैं तुम्हारी बांसुरी में स्वर भरूँगा । 
एक स्वर ऐसा भरूँ कि  तुम जगत को भूल जाओ;
एक स्वर ऐसा भरूँ कि चंद्रको तुम  चूम आओ,
स्वर -सुधा तुममें बहाकर,  ताप सब पल में हरूँगा ।
स्वर भरूँगा।। 

तार कुछ ऐसे मिले कि स्वर्ग तुम भू पर उतारो,
मरण  को देखकर चुनौती स्नेह से जीवन सँवारो;
जागरण की ज्योति से मैं तब तुम्हें ज्योतित करूंगा।
स्वर भरूँगा।। 

दूर, - उस ध्रुवतारिका में लक्ष्य तुम अपना निहारो;
प्रेम-गंगा में नहा कर,  मुक्ति का घूँघट उघारो,
मुग्ध बासंती पवन बन  सुरभि-घन तुम पर मरूंगा। 
स्वर भरूँगा।। 

ज्वार कुछ ऐसा उठे जो दो तत्वों को एक कर दे;
प्यार की अठखेलियां से, मृत्यु का अभिषेक कर दे;
मिलन का मधु-पर्व होगा, और मैं तुमको  वरुंगा।  
स्वर भरूँगा।। 

मैं तुम्हारी बांसुरी में स्वर भरूँगा । 

- नर्मदा प्रसाद खरे 

 

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