जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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तुमने मुझको देखा... (काव्य)

Author: श्री गिरिधर गोपाल

तुमने मुझको देखा मेरा भाग खिल गया ।
मेघ छ्टे सूरज निकला हिल उठीं दिशाएं,
दूर हुईं पथ से बाधा मनसे चिंताएं,
तुमने अंक लगाया मेरा शाप धुल गया ।

केंचुल छूटी आज नया मैं रूप रहा धर
ज्योति हृदय के भीतर ज्योति हृदय के बाहर,
तुम मुस्काए सपनों को आकार मिल गया ।

धरती के नूपुर नभ की बांसुरिया बाजे,
मेरे आगे खुलते से जाते दरवाजे,
तुम कुछ बोले मुझको जीवन सार मिल गया ।


श्री गिरिधर गोपाल
[ राष्ट्र भारती, नवंबर 1953]

 

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