हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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हिंदी वालों को अटल-पताका की डोर फिर थमा गया विश्व हिंदी सम्मेलन (विविध)

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Author: प्रो.वीरेंद्र सिंह चौहान

तीन साल में एक बार आयोजित होने वाला हिंदी का वैश्विक मेला अर्थात विश्व हिंदी सम्मेलन बीते दिनों मॉरिशस के पाई में स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में संपन्न हुआ। सम्मेलन से ठीक 2 दिन पहले जाने-माने हिंदी प्रेमी और जागतिक पटल पर हिंदी के सबसे प्रभावी ध्वज वाहकों में से एक पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का महाप्रयाण हो गया था। स्वाभाविक रुप से ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन पर कवि साहित्यकार, पत्रकार व राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी के निधन की छाया प्रारंभ से अंत तक बनी रही। सम्मेलन से मेले और उल्लास का भाव तो अटल जी के परलोक गमन के चलते चला गया। मगर ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को लेकर हिंदी वालों को उस डोर का छोर जरूर मिल गया जिसे थाम कर विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में प्रथम हिंदी संबोधन के साथ अटल जी ने विश्व गगन में हिंदी की गौरव ध्वजा फहरायी थी।

इस वैश्विक आयोजन की धुरी विदेश मंत्रालय होता है। उद्घाटन सत्र में अपने संबोधन में विदेश मंत्री के रूप में स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की वर्तमान उत्तराधिकारी श्रीमती सुषमा स्वराज ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में नए सिरे से पुरजोर प्रयत्न करने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में जो भी बाधाएं हैं उन्हें दूर किया जाएगा। बाद के औपचारिक मंथन और अनोपचारिक चर्चाओं में भी विद्वान हिंदी प्रेम यूनिस मसले पर खुलकर चर्चा की। और समापन सत्र में मेज़बान देश के मार्गदर्शन मंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने भी कहा कि हिंदी को यह स्थान दिलवाने के लिए एक देश के रूप में मारीशस हर सम्भव उपाय करेगा।

बात जब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनवाने की चली तो भारत में राजकीय कामकाज में हिंदी की वर्तमान स्थिति पर टीका टिप्पणी होना भी आवश्यक था। हिंदी के प्रति वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के अनुराग को लेकर जहां कोई विवाद नहीं दिखता, वहीं इस बात से इंकार करना गलत होगा कि अभी हिंदी को उसके अपने घर अर्थात हिंदुस्थान में ही अपनी वह स्थिति प्राप्त करने के लिए जूझना पढ़ रहा है, जिसकी वह वास्तविक अधिकारी है।

स्वदेश में इस स्थिति के लिए दोष हिंदी को नहीं बल्कि व्यवस्था पर आज भी हावी और प्रभावी हिंदी विरोधी मानसिकता को ही दिया जा सकता है। जो कार्य हम हिंदुस्थानी विदेशी भाषा अंग्रेजी में करना सरल और सहज समझते हैं, वह सब कार्य उतनी ही सहजता और सुगमता के साथ हिंदी में करना संभव है। कई मामलों में एक भाषा के रुप में हिंदी भारत में उसकी प्रतिद्वंद्वी और सौतन बनकर उभरी व जमी अंग्रेजी से कहीं बेहतर है। आवश्यकता है तो अंग्रेजीदां मानसिकता से देश के प्रबुद्ध वर्ग को मुक्ति दिलाने की। मनों की स्वतंत्रता का यह संग्राम चल तो रहा है मगर इसे विजयश्री वाले छोर तक ले जाने के लिए इस विश्व हिंदी सम्मेलन के बाद और अधिक तीव्रता से चलाएं जाने की आवश्यकता है।

खैर, इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी की ‘दशा ओर दिशा' पर चिंतन-मंथन के साथ विमर्श का केंद्रीय विषय था ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी'। हिंदी किस प्रकार भारतीय संस्कृति की सबसे प्रभावी संवाहक के रूप में अतीत में काम करती रही है और भविष्य में कर सकती है, इन सवालों पर प्रतिभागियों ने अपने-अपने अंदाज में मन की बात कही। एक सत्र सिनेमा और हिंदी को समर्पित रहा तो एक-दूसरे प्रमुख सत्र में संचार माध्यमों की हिंदी को लेकर शिखर विद्वान वर्तमान परिदृश्य पर मुखर हुए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की तेजी से बदलती दुनिया में हिंदी कितना आगे बढ़ी है और आज कहां खड़ी है ? इस पर भी विस्तार से चिंतन मनन किया गया। कुल मिलाकर मॉरिशस के पाई नामक स्थान पर आयोजित इस 3 दिवसीय जुटाव के लिए विश्व भर से आए हिंदी विद्वानों और हिंदी सेवियों के समक्ष वह अधिकांश सवाल किसी न किसी रूप में उछले तो अवश्य जो आज एक विश्व भाषा के रुप उभरने को आतुर हिंदी के सम्मुख मुंह बाये खड़े हैं। इनमें से कुछ के संभावित जवाब भी आए। सम्मेलन के बाद यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि विदेश मंत्रालय और भारत सरकार के अन्य अंग-प्रत्यंग ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन रुपी विचार-मंथन से निकले विष और अमृत दोनों का हिंदी-हित में सदुपयोग करेंगे। भोपाल में आयोजित हुए दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की अनुवर्ती कार्यवाही रिपोर्ट के नाते 'भोपाल से मॉरिशस तक' नामक जो पुस्तक विश्व हिंदी सम्मेलन के पटल पर रखी गई, उसे विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज की विश्व में हिंदी और विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रति संजीदगी का प्रमाण कहा जा रहा है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदी के प्रति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के आग्रह के कारण ही भोपाल सम्मेलन के बाद एक अनुशंसा अनुपालना समिति का गठन हुआ था। पिछले सम्मेलन की हिंदी विषयक संस्तुतियों को लागू करने के लिए जो प्रयास हुए, उन्हें विधिवत दस्तावेजों में उकेरा गया है। मॉरीशस सम्मेलन में आए रचनात्मक और उपयोगी सुझाव भी उसी शैली में या यूं कहिए कि उससे भी कहीं अधिक धारदार ढंग से आगामी कार्य योजना का आधार बनने चाहिए। मॉरिशस के पाई से विश्व-गगन में हिंदी की नए सिरे से चढ़ाई का सिलसिला शुरु होना ही चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व हिंदी सम्मेलन की स्मारिका के लिए भेजे अपने संदेश में लिखा कि भारत के आर्थिक विकास और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में उसकी पहचान के कारण विश्व समुदाय में हिंदी का महत्व निश्चित रूप से बढ़ा है।

यहां यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हालिया विश्व हिंदी सम्मेलन विश्व समुदाय में भारत के और भारतीय संस्कृति की ध्वज-वाहिका हिंदी के नए आभामंडल के प्रकाश में आयोजित हुआ। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जैसे भारत की उपस्थिति उत्तरोत्तर और अधिक प्रभावी और गरिमापूर्ण होती जा रही है, हिंदी का स्थान भी उसी अनुक्रम में अधिकाधिक असरदार बनना चाहिए। और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधना करते हुए हमें यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं है। विश्व भर में हिंदी बोलने वाले और हिंदी के प्रति अनुराग रखने वाले लोग फैले हुए हैं। भारत के प्रति संसार की बढ़ती हुई रुचि के कारण आर्थिक, सामरिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक, जो भी हों, जो भी व्यक्ति,संस्थान या देश अपनी इस क्षुधा और जिज्ञासा को शांत करना चाहेगा, उसे हिंदी रूपी द्वार को अंगीकार और पार करना होगा। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण आयाम यह भी है कि हम हिंदी वाले नवल वैश्विक परिवेश और प्रश्नों के प्रकाश में हिंदी की वृद्धि और समृद्धि के लिए क्या क्या करने के लिए कटिबद्ध है।

*लेखक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष और निदेशक हैं तथा विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेकर लौटे हैं।

 

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