वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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चेतावनी (काव्य)

Author: हरिकृष्ण प्रेमी

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।  

राष्ट्र राष्ट्र से तूने कहा है
क्रोध निर्बलता ह्रदय की, 
स्वार्थ है संताप की जड़,
शील है अनमोल गहना।।

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।

यह न समझो मुक्ति पाकर
कर चुके कर्तव्य पूरा
देश को श्री शक्ति देने
के लिए है कष्ट सहना

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।

देश को बलयुक्त करने
यदि ना संयम से चले हम
काल देगा दासता की
फिर हमें जंजीर पटना।

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।

भीत हो कानून से मन
राह पर आता नहीं है,
अग्रसर होना कुपथ पर
वासना का मान कहना।  

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।

मानकर आदेश तेरा
ले अहिंसा पथ ग्रहण कर,
बंद होगा भूमि पर तब,
मानवों  का रक्त बहना।

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।

-हरिकृष्ण प्रेमी 

 

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