जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

Find Us On:

English Hindi
Loading

हलीम 'आईना' के दोहे  (काव्य)

Author: हलीम 'आईना'

आज़ादी को लग चुका, घोटालों का रोग।
जिसके जैसे दांत हैं, कर ले वैसा भोग ॥

ख़ाकी में काला मिला, उसमें मिला सफ़ेद।
यही तिरंगी रूप है, लोक-तंत्र का भेद ॥

छत पर मोरा-मोरनी, बैठे आँखें भींच । 
इक अबला का चीर जब, दुष्ट ले गया खींच॥

जीवन भी इक व्यंग्य है, इसको पढ़ ले यार । 
जिसने ख़ुद को पढ़ लिया, उसका बेड़ा पार ॥

माँ है मंदिर का कलश, मस्जिद की मीनार।
ममता माँ का धर्म है, और इबादत प्यार ॥

जब जुगनू के सामने, दीप करे ख़ुद  रास। 
'आईना' तब जान लो, अंत दीप का पास ॥

बेटे-बहुओं को लगे, बूढ़ी अम्मा भार । 
दो रोटी के वास्ते, रोज़  चले तकरार ॥

- हलीम 'आईना' 
[ हँसो भी....हँसाओ भी...., सुबोध पब्लिशिंग  हाउस, कोटा ]

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश