वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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ते ताही और बरसात (कथा-कहानी)

Author: प्रीता व्यास 

बहुत पुरानी बात है। दादी की दादी की दादी से भी बहुत-बहुत पहले की। सफेद बादलों के देश में एक बार खूब बारिश हुई, खूब।  इतनी की सब जल-थल हो गया । एक गांव  (Kainga)  था जिसमें बसने वालों ने कहना शुरू कर दिया कि यह बारिश ते ताही ही लेकर आई है। ते ताही ने अपने जादू से सारी धरती को डुबो देने जितनी बारिश करवाई है। 

ते ताही गांव में रहने वाला एक युवक था जिसके बारे में गांव के लोग कहते थे कि वह जादू जानता है। भारी बारिश से परेशान गांव वालों ने तय किया कि ते ताही को गांव से दूर कहीं छोड़ दिया जाए ताकि बारिश रुक जाए और बगीचों में फिर हरियाली छा उठे, खेती संभव हो सके।

गांव के कुछ लोग एक नाव पर ते ताही को बिठाकर दूर समंदर में निकल पड़े।  खेते-खेते वे एक अन्य निर्जन द्वीप पर जा पहुंचे। उन्होंने ते ताही को वहां उतार दिया और वापस लौट पड़े।

ते ताही ने जब जाना कि उसे अकेला छोड़ दिया गया है तो उसने सीटी बजाकर व्हेलों को तट के पास बुलाया और उनकी पीठ पर सवार होकर अपने गांव लौट आया।  व्हेल  तेज़  तैरती है सो वह उस नौका से पहले पहुंच गया जो उसे छोड़ने गई थी। जब नाव वापस पहुंची तो उस पर सवार लोगों ने देखा कि ते ताही तो वहां मौजूद है। उन्हें लगा कि उन्होंने ते ताही के साथ गलत किया। सब ने तय किया कि ते ताही को गांव से नहीं निकाला जाएगा, वह साथ ही रहेगा।

इसके बाद से ते ताही पूरी उम्र अपने गांव में ही रहा।  जब वह बूढ़ा हो गया तो उसने एक दिन अपने आप को एक तानिफा  (Taniwha - दैत्य )  में बदल लिया और अपने मित्र व्हेल मछलियों के पास रहने चला गया ।

-प्रीता व्यास 
[पहाड़ों का झगड़ा, (माओरी लोक कथाएं) राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत]

 

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